परमहंस राम मंगलदास जी की 131वीं जयंती पर विशेष।

अयोध्या। प्रभु श्री राम की नगरी अयोध्या सिद्धों की साध्यस्थली है।यहाँ से उदीयमान सिद्ध संतों ने समय समय पर देश का आध्यात्मिक मार्गदर्शन किया है। सिद्धि के शिखर पर विराजमान इन्हीं तेजपुंजों में एक परमहंस राममंगलदास जी का नाम रामनगरी में अत्यंत आदर से लिया जाता है।नित्य अनाहत नाद सुनने एवं युग युगान्तरों के देवी देवताओं संत महापुरुषों से साक्षात्कार करने के लिए प्रसिद्ध परमहंस जी का जन्म फाल्गुन कृष्ण दशमी 12 फरवरी 1893 को उत्तर प्रदेश जनपद सीतापुर ग्राम ईश्वरवारा के एक प्रतिष्ठित कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ था।आपके बचपन का नाम अर्जुन लाल था।अल्पायु में ही पत्नी पुत्र के दिवंगत होने के उपरान्त आप अयोध्या में आकर तत्कालीन रामघाट पर विराजमान श्री रामानन्द सम्प्रदाय के महाविरक्त वैष्णव संत बाबा वेणीमाधवदास जी महाराज से तारक राम मंत्रराज की दीक्षा लेकर साधना पथ पर अग्रसर हुए। आपने गुरुआज्ञा से कई वर्षों तक विभिन्न तीर्थों की यात्रा करते हुए नामसाधना जारी रखी।फिर 28 वर्ष की आयु में स्थाई रूप से गुरुसेवा में तत्पर हुए।सबसे पहले आपको गुरुनानक जी का साक्षात्कार हुआ और गुरुकृपा से शनै: शनै: कई दिव्य आत्माओं का सानिध्य मिलने लगा। आप गीता में कहे गये “वासुदेव:सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:” कोटि के तत्वदर्शी महापुरुष थे। जो जीवमात्र में जनार्दन का दर्शन करते थे। आपको वैद्यक का भी अच्छा ज्ञान था, इसलिए किसी भी रोग से ग्रस्त पशु पक्षी मानव कहीं भी देखते उसे आश्रम पर उठा लाते और उसे औषधि उपचार से स्वस्थ करके ही जाने देते। आपके गुरुदेव तो कड़क स्वभावी परन्तु आप तो बहती गंगा थे। जो पात्रापात्र का विचार किये बिना सबको भगवत् शरणागति का अधिकारी बनाते थे‌। आपके निर्देशन में ही वसिष्ठ कुण्ड के सामने गोकुल भवन नामक स्थान का निर्माण हुआ था। आपके द्वार से कोई उपासा (भूखा) न जाये, यही आपकी उपासना थी। और वह भूख चाहे अन्न की हो वस्त्र की हो धन की को अथवा अध्यात्म की, आप आगत को सब प्रकार से आप्तकाम करते थे‌। सादा जीवन उच्च विचार आपके रोम रोम में समाये थे। आप निर्धन भिक्षुकों को भोजन के अतिरिक्त दक्षिणा सहित सूखी खिचड़ी बंटवाते थे। प्रत्येक ऋतु में मारकीन का मात्र एक अचला लपेटे बिना कुछ बिछाये एक लकड़ी के तख्त पर दिन भर आप केवल इसलिए बैठे रहते कि आध्यात्मिक आधिदैविक या आधिभौतिक रूप से अतृप्त संतृप्त कौन आत्मा कब किधर से आ जाये। आपकी सिद्धि का ऐसा प्रभाव था कि सभी युगों के और सभी धर्म पन्थों के देवी देवता सिद्ध संत आपको अपने आध्यात्मिक विचार लिखवाते थे, जिन्हें बाद में लिपिबद्ध कर चार भागों में प्रकाशित करवाया गया। इनके अतिरिक्त आपने त्रिशताधिक संत भक्तों की कथाएं लिखीं, जिन्हें “भक्त भगवंत चरितावली” नाम से प्रसिद्धि मिली। जगद्गुरु रामानन्दाचार्य जी के प्रामाणिक जीवन चरित्र प्रसंग पारिजात का पैशाची भाषा से हिन्दी भाषा में सफल अनुवाद करवाने का श्रेय भी आपको ही जाता है, जिसकी सिद्ध अष्टपदियों के अनुष्ठान से साधक को सहज ही लोकोत्तर सिद्धि प्राप्त हो जाती है। इसके अतिरिक्त प्रसिद्ध भरतकुंड का पुनरुद्धार वहीं गयावेदी पर बारादरी का निर्माण विष्णुपाद की स्थापना तथा भरत जी के प्राचीन मन्दिर के पुनर्निर्माण आदि लोकोत्तर कार्य आपकी प्रेरणा व प्रोत्साहन से मूर्तरूप ले सके। आपने विभिन्न स्थानों पर अनेको जलाशयों एवं देवोलयों का जीर्णोद्धार करवाया। आप मंदिरों के अपेक्षा नवनिर्माण की अपेक्षा जीर्ण शीर्ण मंदिरों के जीर्णोद्धार और उसमें स्थापित देवविग्रहों पूजा सेवा हेतु विधि व्यवस्था करवाने के प्रबल पक्षधर थे। साधनापथ पर नैच्यानुसंधान आवश्यक ही नहीं अनिवार्य होता है।नेच्यानुसंधान अर्थात स्वयं को सबसे तुच्छ समझने की स्वीकारोक्ति! परमात्मदर्शन की सहज कुंजी बताते हुए आपके कुछ उपदेश अत्यंत मारक थे, जैसे-घूर हो जाओ।बिना किसी दोष के आपको सौ जूते मारे जायें, तब मन से भी क्रोध क्षोम विषाद न हो भगवत्प्राप्ति सुनिश्चित हो जायेगी।अनेक अमूल्य लोकोत्तर उपदेश आप केवल वाणी से नहीं,अपने चरित्र से भी चित्रित करते थे।परमहंस राममंगलदास जी लोकोत्तर उदार आध्यात्मिक भावना का परिचय इससे भी प्राप्त होता है कि एक बार आपने अपने गुरुदेव से यही वरदान मांगा कि आपके बाद जो मेरा मान सम्मान पूजन करे, उसकी अपेक्षा उसे पहले सद्गति हो हमें तिरस्कृत अपमानित और निंदा करे।कुल मिलाकर आपके आध्यात्मिक साहित्यिक और पारमार्थिक अवदानों की श्रृंखला बहुत लम्बी है।इस प्रकार तन मन धन से जन जन की सेवा का सदा व्रत चलाने वाले महान लोकोपकारी व्यक्तित्व परमहंस जी पौष शुक्ल नवमी 31 दिसम्बर 1984 को अपने निज निवास बजरंग भवन में ब्रह्मलीन हो गये।अनाहत नाद आनन्द में निमग्न सुरति शब्दयोग के मर्मज्ञ परमहंस राममंगलदास जैसे महापुरुष धरती पर यदा कदा आते हैं, और सर्वदा प्रासंगिक रहते हैं।
-आचार्य सन्तोष अवस्थी सनातन।

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