हरदोई से संतोष तिवारी की रिपोर्ट,
शाहाबाद/हरदोई। बेसिक शिक्षा विभाग में निष्पक्ष निरीक्षण और पारदर्शी कार्रवाई का दावा उस समय खटाई में पड़ गया जब खंड शिक्षा अधिकारी शाहाबाद के निरीक्षणों को लेकर शिक्षकों में गहरा असंतोष पनपने लगा है। आरोप है कि बीईओ विद्यालय निरीक्षण के नाम पर केवल चुनिंदा शिक्षकों को निशाना बनाते हैं, जबकि कुछ चहेते शिक्षकों पर लगातार रहमदिली दिखाई जाती है। इससे विभाग में सचेत करने वाली और चिंताजनक स्थिति पैदा हो गई है।
मिली जानकारी के अनुसार बीईओ द्वारा की जाने वाली कार्रवाई किसी भी तरह शैक्षणिक गुणवत्ता या विद्यालयी व्यवस्था पर आधारित नहीं होती,बल्कि व्यक्तिगत समीपता, जातीय और वर्गीय समीकरणों पर निर्भर दिखाई देती है। कई शिक्षकों का आरोप है कि बीईओ निरीक्षण के दौरान छोटी-छोटी कमियों को आधार बनाकर निश्चित शिक्षकों को निशाना बनाते हैं, वहीं कुछ शिक्षकों को भारी अनियमितताओं के बावजूद छूट दे दी जाती है। उनके अनुसार, इस पक्षपातपूर्ण व्यवहार ने कार्यस्थलों पर भय और असुरक्षा का माहौल खड़ा कर दिया है।
शिक्षकों के एक वर्ग का दावा है कि सजातीय और एक विशेष अल्पसंख्यक वर्ग के शिक्षकों को बीईओ की तरफ से विशेष संरक्षण मिलता है। चाहे उपस्थिति, अध्यापन,छात्रों के सीखने के स्तर या विद्यालय प्रबंधन की गतिविधियों में कमी हो, कार्रवाई उन पर शायद ही देखने को मिलती है। इसके विपरीत, उन शिक्षकों पर सख्ती बरती जाती है जो न तो उनके करीबी हैं और न ही उनसे लाभ लेने की इच्छा रखते हैं। इसमें नोटिस जारी करना, स्पष्टीकरण मांगना, नकारात्मक रिपोर्ट भेजना और लगातार निरीक्षण में केवल उन्हीं को लक्ष्य बनाना जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं।
और भी चौंकाने वाला आरोप उस वक्त सामने आया जब शिक्षकों ने बताया कि वर्षों से बीईओ कार्यालय में जमे एक चतुर्थ श्रेणी कर्मी का अत्यधिक प्रभाव है। बताया जा रहा है कि वही कर्मचारी तय करता है कि किस शिक्षक पर दबाव बनाया जाना है और किसे संरक्षण देना है। शिक्षकों का कहना है कि यह कर्मचारी बीईओ की आंख,कान और दिमाग बन चुका है तथा निरीक्षण के एजेंडे से लेकर कार्रवाई की सूची तक पर उसका नियंत्रण है।
शिक्षकों का तर्क है — “खंड शिक्षा कार्यालय नीति से नहीं,बल्कि किसी कर्मचारी के निजी समीकरण के आधार पर चल रहा है।”
इस पक्षपातपूर्ण रवैये का सीधा असर विद्यालयों के शैक्षणिक वातावरण पर पड़ रहा है। जहां कुछ शिक्षक लगातार परेशान और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, वहीं चहेते शिक्षक आत्मविश्वास से भरे रहते हैं और किसी भी प्रकार की जांच का भय नहीं रखते। इससे कार्यस्थल पर दोहरे मानदंड स्थापित हो रहे हैं, जिसका स्कूलों के संचालन और शिक्षा की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पढ़ना स्वाभाविक है।
शिक्षकों का कहना है कि निरीक्षण का उद्देश्य विद्यालयों में सुधार और शैक्षणिक गुणवत्ता बढ़ाना होना चाहिए, लेकिन वर्तमान स्थिति में निरीक्षण डर और प्रताड़ना का साधन बन गया है। कई शिक्षकों ने यह भी आरोप लगाया कि यदि कोई शिक्षक व्यवस्थाओं पर सवाल उठाता है या पक्षपात की शिकायत करता है, तो उसे और अधिक लक्षित किया जाता है। कुछ मामलों में शिक्षकों को बिना आधार नोटिस जारी कर परेशान किया गया है।
शिक्षकों का यह भी मानना है कि बीईओ निरीक्षण के दौरान सबसे अधिक समय उन्हीं विद्यालयों में बिताते हैं जहां बदलाव की आवश्यकता नहीं होती, जबकि उन विद्यालयों में बहुत कम जाते हैं जहां स्थिति सुधारने की ज़रूरत है। इससे साफ संकेत मिलता है कि निरीक्षण सुधार के लिए नहीं, बल्कि लक्षित कार्रवाई के लिए किया जा रहा है।
स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अब शिक्षकों ने सामूहिक रूप से सवाल उठाना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि —
- 🔹 निरीक्षण की प्रक्रिया पारदर्शी हो
- 🔹 सभी के साथ समान व्यवहार किया जाए
- 🔹 कार्रवाई के लिए स्पष्ट और सार्वजनिक मानदंड तय हों
- 🔹 कार्यालय में वर्षों से जमे कर्मचारियों का प्रभाव समाप्त किया जाए
शिक्षकों के अनुसार, “शिक्षा विभाग में पारदर्शिता, निष्पक्षता और समानता जरूरी है। यदि निरीक्षण का मकसद सुधार के बजाय प्रतिशोध और पक्षपात बन जाए, तो इसका दुष्परिणाम पूरा शिक्षा तंत्र भुगतेगा — और सबसे अधिक नुकसान छात्रों को होगा।”
अब सवाल यह है कि क्या उच्च अधिकारी इस मामले को गंभीरता से लेकर जांच करेंगे?
क्या निरीक्षण और कार्रवाई की नीति में बदलाव होगा?
या फिर शिकायतें कागज़ों में दबकर रह जाएंगी और पक्षपात का सिलसिला चलता रहेगा?
शिक्षकों ने उम्मीद जताई है कि विभाग इस मुद्दे पर हस्तक्षेप करेगा और खंड शिक्षा कार्यालय में निष्पक्ष कार्यशैली फिर से स्थापित की जाएगी — क्योंकि शिक्षा व्यवस्था में सुधार तभी संभव है, जब निरीक्षण न्यायपूर्ण और समान हो।
