शाहाबाद/हरदोई। क्षेत्र के बेसिक शिक्षा विभाग में इन दिनों खंड शिक्षा अधिकारी शाहाबाद राजेश कुमार की कार्यशैली को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।विद्यालय निरीक्षण के नाम पर निष्पक्ष कार्रवाई के बजाय पसंद–नापसंद के आधार पर निर्णय लिए जाने के आरोप जोर पकड़ते जा रहे हैं। कई शिक्षक दावा कर रहे हैं कि बीईओ द्वारा कुछ चहेते शिक्षकों पर रहमो करम दिखाया जाता है, जबकि कुछ विशेष वर्ग के शिक्षकों को लगातार टारगेट किया जाता है।
शिक्षकों के अनुसार,विद्यालय निरीक्षण के दौरान खामियों और अनियमितताओं को दरकिनार कर बीईओ उन शिक्षकों पर सख्ती दिखाते हैं जो उनकी पसंद सूची में नहीं आते। वहीं, जिन शिक्षकों से बीईओ की निकटता है, उन पर न तो जांच की पहल की जाती है और न ही शैक्षणिक कमियों पर कोई कार्रवाई। इस भेदभावपूर्ण रवैये को लेकर शिक्षा जगत में असंतोष और बेचैनी साफ तौर पर दिखाई दे रही है।
आरोप यह भी हैं कि कार्रवाई का दायरा किसी भी तरह शैक्षणिक गुणवत्ता पर आधारित नहीं है,बल्कि वर्ग,जातिगत समीकरण और व्यक्तिगत समीपता पर टिका हुआ है।सूत्रों के अनुसार,सजातीय और एक विशेष अल्पसंख्यक वर्ग के शिक्षकों के प्रति बीईओ का रवैया बेहद उदार रहता है। वहीं,दूसरे वर्ग के शिक्षकों को छोटी-छोटी बातों को आधार बनाकर नोटिस,चेतावनी और विभागीय कार्रवाई में उलझाने की कोशिश की जाती है। इससे विभाग में निष्पक्षता और समानता की भावना कमजोर होती दिखाई दे रही है।
सिर्फ निरीक्षण प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि कार्यालयी कामकाज पर भी कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं। शिक्षकों का आरोप है कि वर्षों से जमे एक चतुर्थ श्रेणी कर्मी के इशारे पर कार्रवाई और रिपोर्ट तैयार करवाई जाती है। बताया जाता है कि उक्त कर्मचारी का कार्यालय पर अत्यधिक प्रभाव है और वह तय करता है कि किस शिक्षक पर सख्ती बरती जानी है और किसे संरक्षण देना है। यह स्थिति न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था के लिए चिंताजनक है बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता पर भी प्रश्नचिन्ह खड़े करती है।
शिक्षकों का यह भी कहना है कि बीईओ की कार्यशैली का परिणाम यह हो रहा है कि शिक्षकों के बीच भय,असुरक्षा और असंतोष का माहौल बन गया है। जो शिक्षक पूरी निष्ठा से कार्य कर रहे हैं,वह भी यह सोचकर परेशान हैं कि कहीं व्यक्तिगत पक्षपात के चलते वे भी अनावश्यक कार्रवाई की चपेट में न आ जाएं। शिक्षा व्यवस्था में सुधार और अधिकारों की रक्षा के लिए बनाया गया निरीक्षण तंत्र यदि भेदभाव में बदल जाए, तो स्कूलों की प्रगति रुकना स्वाभाविक है।
कई शिक्षकों ने मांग की है कि विभाग को इस मामले में हस्तक्षेप कर निरीक्षण एवं कार्रवाई की पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए। शिकायत यह भी है कि कार्रवाई के नाम पर लक्षित शिक्षकों को प्रताड़ित किया जाता है,जबकि चहेते शिक्षकों की कमियों को नजरअंदाज किया जाता है। ऐसी स्थिति में शैक्षिक माहौल में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और निष्पक्षता की भावना समाप्त होती जा रही है।
शिक्षकों का कहना है कि “शिक्षा विभाग में समान व्यवहार और निष्पक्ष कार्यवाही अनिवार्य है। यदि अधिकारी खुद भेदभाव करने लगेंगे, तो शिक्षण व्यवस्था पर इसका सीधा विपरीत प्रभाव पड़ेगा।” उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह मामला सिर्फ व्यक्तिगत असंतोष का नहीं, बल्कि पूरी शैक्षिक व्यवस्था की विश्वसनीयता और नैतिकता से जुड़ा हुआ है।
अब सवाल यह है कि क्या उच्चाधिकारी इस मामले की पूरी जांच कर पारदर्शिता सुनिश्चित करेंगे या फिर शिक्षकों की शिकायतें केवल दफ्तरों की फाइलों में दबकर रह जाएंगी?
शिक्षकों में यह उम्मीद बनी हुई है कि विभाग मामले को गंभीरता से लेकर निष्पक्ष सिस्टम बहाल करने की दिशा में ठोस कदम उठाएगा — क्योंकि शिक्षा व्यवस्था में सुधार तभी संभव है, जब कार्रवाई समान और न्यायपूर्ण हो।
