गर्रा नदी किनारे हजारों बीघा भूमि पर दशकों से माफिया काबिज,तहसील प्रशासन बेबस
हरदोई से संतोष तिवारी की रिपोर्ट,
हरदोई। क्या सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा हटवाना प्रशासन के लिए असंभव हो चुका है? क्या दबंगई और राजनीतिक संरक्षण कानून को चुनौती दे रहे हैं? ऐसे सवाल गर्रा नदी के तराई क्षेत्र में सामने आ रहे हालात को देखकर स्वाभाविक रूप से उठ रहे हैं। नदी के किनारे स्थित कई गांवों में हजारों बीघा सरकारी जमीन पर दशकों से दबंगों और प्रभावशाली लोगों का कब्जा बना हुआ है,और इसके बावजूद प्रशासनिक अमला कार्रवाई की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक जिन गांवों में बड़े पैमाने पर अवैध कब्जे किए गए हैं, उनमें गढ़ेपुर,बेहटा कोला,परियल, पुरवा पिपरिया,कालागाड़ा, झोथूपुर सुहागपुर,बासित नगर नवादा, किलकिली,सिंगुलापुर,अतर्जी, दरियापुर बलभद्र,बैजूपुर,खानू शंकरपुर,नगला खानपुर और नसौली गोपाल सहित कई गांव शामिल हैं। नदी की जमीन को अवैध रूप से जोतकर खेती की जा रही है और सरकारी भूमि से आर्थिक लाभ भी उठाया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि इन गांवों में कब्जाधारियों का विरोध करना ग्रामीणों के लिए चुनौतीपूर्ण हो चुका है क्योंकि कब्जे धारक अपनी पहुँच और शक्ति के दम पर खुलेआम दबंगई का प्रदर्शन करते हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि सत्ता संरक्षण के चलते तहसील और राजस्व विभाग के अधिकारी कार्रवाई करने से बचते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार शिकायतें उच्च अधिकारियों तक पहुंचाई गईं, दस्तावेज़ों सहित प्रमाण भी सौंपे गए,लेकिन नतीजा शून्य रहा। शिकायतकर्ताओं के मुताबिक, अवैध कब्जों को बचाने में तहसील प्रशासन की संलिप्तता के पुख्ता सबूत मौजूद हैं,फिर भी अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
गौरतलब है कि गर्रा नदी के तराई क्षेत्र की इस सरकारी भूमि का उद्देश्य सार्वजनिक उपयोग, पर्यावरण संरक्षण और बाढ़ नियंत्रण माना जाता है। लेकिन भूमि पर अवैध कब्जा न केवल सरकारी संपत्ति की खुली लूट है बल्कि भविष्य में गंभीर पर्यावरणीय खतरे को भी जन्म दे सकता है। नदियों के बहाव क्षेत्र पर अतिक्रमण बाढ़ के समय बड़े हादसों का कारण बन सकता है।
कानून के अनुसार नदी तट की भूमि पर कब्जा करना दण्डनीय अपराध है और 151/447/441 सहित कई धाराओं के तहत सख्त कार्रवाई की जा सकती है,लेकिन जमीनी स्तर पर प्रशासनिक निष्क्रियता ने अवैध कब्जाधारियों के हौसले इतने बुलंद कर दिए हैं कि वे खुलेआम सरकारी जमीन को अपनी पैतृक संपत्ति की तरह उपयोग कर रहे हैं।
ग्रामीणों की मांग है कि जनहित और कानून के सम्मान को देखते हुए जिले के वरिष्ठ अधिकारी तुरंत संज्ञान लें,राजस्व एवं पुलिस विभाग की संयुक्त टीम गठित कर नदी किनारे की भूमि को अवैध कब्जों से मुक्त कराया जाए,और कब्जाधारियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए। लोगों का कहना है कि यदि प्रशासन अपनी भूमिका ईमानदारी से निभाए तो कुछ ही दिनों में हजारों बीघा सरकारी भूमि मुक्त कराई जा सकती है।
