बेटियों की सुरक्षा और स्वास्थ्य के दावों की पोल खोलता मामला
बिलहरी/हरदोई। सरकार की ओर से बेटी बचाओ–बेटी पढ़ाओ, महिला सुरक्षा, महिला सशक्तिकरण और बालिकाओं के स्वास्थ्य के नाम पर चलाए जा रहे अभियान उस समय कठघरे में खड़े दिखाई देते हैं, जब जमीनी हकीकत में जिम्मेदार ही बेटियों की अनदेखी करने लगें। ऐसा ही शर्मनाक मामला कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय बिलहरी में सामने आया है, जहां छात्राएं कई दिनों से बीमार थीं, लेकिन न विद्यालय प्रबंधन ने खबर ली और न ही समय पर इलाज की व्यवस्था की गई। लापरवाही का आलम यह रहा कि बच्चियों की हालत ज्यादा बिगड़ने के बाद ही उन्हें कम्युनिटी हेल्थ सेंटर (सीएचसी) ले जाया गया।
विद्यालय परिसर में रहने वाली छात्राओं के स्वास्थ्य और सुरक्षा की जिम्मेदारी वार्डन एवं प्रबंधन पर होती है, लेकिन यहां यह जिम्मेदारी सिर्फ कागजों में दिखाई देती है। छात्राएं कई दिनों से गंभीर खांसी और कमजोरी की शिकायत से जूझ रही थीं, मगर न रोजाना स्वास्थ्य परीक्षण कराया गया और न ही डॉक्टर की सलाह ली गई। सूत्रों के मुताबिक बच्चियों ने तबीयत खराब होने की शिकायत कई बार की, लेकिन वार्डन ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। अंततः छात्राओं की हालत बिगड़ने पर ही घबराकर उन्हें अस्पताल ले जाया गया।
सीएचसी पहुंचे पर दोनों छात्राएं बुरी तरह खांस रही थीं। अस्पताल में तैनात डॉक्टर जीशान ने बच्चियों की जांच कर दवाइयां दीं। चिकित्सकों के अनुसार, बच्चियों को समय रहते इलाज मिलता तो स्थिति इतनी गंभीर न होती। यह घटना साफ तौर पर दर्शाती है कि विद्यालय में स्वास्थ्य से जुड़ी व्यवस्थाएं सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई हैं।
मामले पर जब खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) राजेश कुमार से प्रतिक्रिया मांगी गई तो उन्होंने हैरान करने वाला बयान देते हुए कहा कि उन्हें इस संबंध में कोई जानकारी नहीं दी गई। इसका मतलब स्पष्ट है—या तो विद्यालय प्रबंधन ने जानकारी छिपाई या अधिकारियों को बच्चियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा से कोई सरोकार नहीं। और जब मीडिया ने वार्डन के खिलाफ कार्रवाई और जांच की बात पूछी, तब भी बीईओ सवालों से बचते रहे। उनके पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं था और न ही उन्होंने इस गंभीर मामले पर कोई ठोस कदम उठाने की घोषणा की।
सबसे चौंकाने वाला निर्णय उस समय देखने को मिला जब बीईओ ने वार्डन को फोन पर निर्देश दिया कि “बच्चियों के परिजनों को बुलाकर उन्हें घर भेज दिया जाए।” इससे यह संदेश साफ निकलकर आता है कि प्रबंधन बीमारी का इलाज कराने की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर मामले को दबाना चाहता है। छात्राओं को विद्यालय से घर भेज देना समाधान नहीं, बल्कि शिक्षा के अधिकार पर कुठाराघात है। यदि बच्चियां घर चली जाएंगी तो पढ़ाई बाधित होगी और विद्यालय प्रशासन की लापरवाही पर पर्दा भी पड़ जाएगा — शायद यही उद्देश्य था।
कस्तूरबा गांधी विद्यालय का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की बेटियों को सुरक्षित, स्वस्थ और शिक्षित माहौल में आगे बढ़ने का अवसर देना है। लेकिन बिलहरी के इस विद्यालय में जो कुछ हुआ है वह इस उद्देश्य को ध्वस्त करता है। विद्यालय में निवास करने वाली बच्चियों को भोजन, स्वास्थ्य और सुरक्षा की सुविधाएं उपलब्ध कराना जिम्मेदारों की प्राथमिक जिम्मेदारी है, मगर वह जिम्मेदारी यहां उपेक्षा में बदल चुकी है।
महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि —
🔹 अगर बच्चियों के स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखा जा सकता, तो आवासीय विद्यालय चलाने का औचित्य क्या है?
🔹 अधिकारियों के बयानों में विरोधाभास और जिम्मेदारी से बचने की प्रवृत्ति क्यों?
🔹 क्या बेटियों को सिर्फ योजनाओं, पोस्टरों और सरकारी विज्ञापनों तक सीमित कर दिया गया है?
कस्तूरबा गांधी विद्यालय बिलहरी की यह घटना न सिर्फ प्रशासनिक उदासीनता का उदाहरण है बल्कि बेटी बचाओ–बेटी पढ़ाओ अभियान के उद्देश्यों पर सीधा प्रहार है। बेटियों की सेहत से खिलवाड़ कर, बीमारी की हालत में उन्हें घर भेजना और प्रबंधन की लापरवाही पर पर्दा डालना अभियान के ताबूत में कील ठोकने जैसा है।
अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस मामले पर क्या कदम उठाता है —
- क्या जांच होगी?
- क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई की जाएगी?
- या मामला कुछ दिनों में ठंडे बस्ते में पहुंच जाएगा?
बच्चियों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान का मुद्दा किसी भी स्तर पर समझौते का विषय नहीं होना चाहिए। यह केवल चिकित्सा लापरवाही नहीं, बल्कि बेटियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। ऐसे मामलों पर सख्त कार्रवाई और जवाबदेही तय होना बेहद जरूरी है ताकि यह संदेश स्पष्ट हो — बेटियों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
