प्राकृतिक चिकित्सा स्वस्थ जीवन बिताने की एक कला और विज्ञान है: डॉ0 सीडी यादव

विजातीय पदार्थों के जमा होने से होती है रोगों की उत्पत्ति, प्रकृति की रक्षा भी करें
प्रकृति स्वयं सबसे बड़ा चिकित्सक: योगाचार्य अमित सक्सेना
योगाचार्य अंकुर द्विवेदी ने भी सिखाये प्राकृतिक चिकित्सा के गुर

फर्रुखाबाद, समृद्धि न्यूज। राष्ट्रीय प्राकृतिक चिकित्सा दिवस के अवसर पर मेजर एसडी सिंह पीजी आयुर्वेदिक मेडिकल कालेज एवं हॉस्पिटल में स्वस्थवृत्त विभाग द्वारा प्राकृतिक चिकित्सा शिविर एवं कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बद्री विशाल पीजी महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ0 सीडी यादव ने भावी चिकित्सकों को प्राकृतिक चिकित्सा के सूक्ष्म ज्ञान से अवगत कराया और प्राकृतिक चिकित्सा विधियों से कैसे रोगों का उपचार किया जाता है की उपयोगी जानकारी दी।
महाविद्यालय के लेक्चर थिएटर संख्या एक में आयोजित चिकित्सा शिविर में मुख्य अतिथि डॉ0 सीडी यादव ने विभिन्न औषधीय गुण वाले पौधों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि प्रकृति सर्वशक्तिमान है। मानव शरीर प्रकृति के पंचतत्वों से निर्मित है। मिट्टी, पानी, धूप, हवा और आकाश जैसे तत्वों से शरीर की सफाई व मरम्मत करना उचित है। प्राकृतिक चिकित्सा स्वस्थ जीवन बिताने की एक कला एवं विज्ञान है। यह ठोस सिद्वान्तों पर आधारित बिना दुष्प्रभाव के रोग निवारण पद्धति है। स्वास्थ्य, रोग तथा चिकित्सा सिद्धान्तों के संबंध में प्राकृतिक चिकित्सा के विचार अत्यंत मौलिक है। उन्होंने कहा कि वेदों, प्राचीन ग्रंथों में वर्णन है कि विजातीय पदार्थों के जमा होने से ही रोग की उत्पत्ति होती है। जिनकी प्राकृतिक जीवनी शक्ति कमजोर पड़ जाती है। उन्हें प्रकृति व अन्य तरीकों से शरीर के बाहर करती है। जिसे मौसमी रोग कहते हैं। इन्ही मौसमी रोग में गंदगी (विजातीय पदार्थ) को दबा देने पर असाध्य रोग होते हैं। ये विजातीय पदार्थ अप्राकृतिक खानपान, रहनसहन, तनाव, सोने जागने कार्य करने व यौन संबंधी आचरण में विषमता करने से जमा होते रहते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा व्यक्ति को उसके शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक तलों पर प्रकृति के रचनात्मक सिद्धांतों के अनुकूल निर्मित करने की एक पद्धति है। इसमें स्वास्थ्य संवर्धन, रोगों से बचाव, रोग निवारण और पुन: स्थापना कराने की अपूर्व क्षमता है। रोग का मुख्य कारण जीवाणु नहीं है।
कार्यक्रम के अतिथि एवं शिवाय योगपीठ एवं पोषण विज्ञान केन्द्र के संस्थापक योगाचार्य अमित सक्सेना ने कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए कहा कि जीवाणु शरीर में जीवनी शक्ति के कमजोर होने पर विजातीय पदार्थों के जमाव होने पर ही आक्रमण कर पाते हैं। जब शरीर में उनके रहने और पनपने लायक अनुकूल वातावरण तैयार हो जाता है। अत: मूल कारण विजातीय पदार्थ है, जीवाणु नहीं। जीवाणु द्वितीय कारण है। प्रकृति स्वयं सबसे बड़ा चिकित्सक है। शरीर में स्वंय को रोगों से बचाने व अस्वस्थ हो जाने पर पुन: स्वास्थ्य प्राप्त करने की क्षमता विधमान है। इसमें केवल रोग की नहीं बल्कि रोगी के पूरे शरीर की होती है। मनुष्य के शरीर में स्वंय को रोग मुक्त करने को अपूर्व शक्ति है।राजकीय योग वेलनेस सेण्टर के योगाचार्य अंकुर द्विवेदी ने कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए कहा कि प्राकृतिक चिकित्सा में विभिन्न विधियां आहार चिकित्सा, उपवास चिकित्सा, मिट्टी चिकित्सा, जल चिकित्सा, मालिश चिकित्सा, सूर्य किरण चिकित्सा, वायु चिकित्सा, क्षेत्रीय वनौषधियां का बिना दुष्प्रभाव प्रयोग होता है। जिसमें मुख्य उपचार मिट्टी की पट्टी, मिट्टी का स्नान, सूर्य स्नान, गर्म और ठंडा सेंक, कटी स्नान, मेहन स्नान, पैर हाथ का गर्म सेंक, वाष्प स्नान, पूर्ण टब स्नान, रीढ़ स्नान सर्वांग गीली चादर लपेट, छाती की पट्टी व घुटने की पट्टी, एनिमा, जलनेती, वमन, माथे की पट्टी, पेट की पट्टी रोगानुसार मालिश की क्रियाएं की जाती है। यह सरल सहज, उपचार की प्रक्रिया है जिसे हमें जीवन में अपनानी चाहिए। इससे पूर्व मुख्य अतिथि एवं अतिथिगणों ने भगवान धन्वन्तरि के चित्र के समक्ष दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। कार्यक्रम को प्राचार्य डॉ0 सुनील कुमार गुप्ता, उप प्राचार्य डॉ0 जॉली सक्सेना, उप चिकित्सा अधीक्षक डॉ0 नीतू श्री ने भी सम्बोधित किया। कार्यक्रम का संचालन स्वस्थवृत्त विभाग के कार्यकारी विभागाध्यक्ष डॉ0 अरुण कुमार पाण्डेय ने किया। इस अवसर पर डॉ0 अंकुर सक्सेना, डॉ0 संकल्प सिंह आदि की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।

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