विकास की आंधी में न फाग गायन की परम्परा बची और न ही फगुआ की मिठास

फर्रुखाबाद, समृद्धि न्यूज। एक दौर था जब होली के अवसर पर तबले की थाप, मृदंग का घोष और फाग की स्वर लहरियां त्यौहार से पूर्व ही गूंजने लगती थी। इसके साथ ही भौजाइयां फगुआ के रीत रिवाज भी भूल गयी है। होलिकाष्टक लगने के साथ ही टोलिया फाग के गीतों को तबले की थाप और हारमोनियम के स्वरों के मध्य गांव, शहरों में गाते हुए निकलती थी, परन्तु आज आधुनिकता एवं विकास की आंधी में फाग के स्वर और फगुआ की मिठास विलुप्त हो गयी है।
दरअसल फगुआ के रीति वृज क्षेत्र में विशेष महत्व रखती है। इसके पीछे की मंशा यह रही थी कि जिस भाभी के साथ होली देवरों द्वारा खेली जाती थी, उसे देवर राजा अगले दिन कुछ मिष्ठान, नमकीन खिलाने ले जाते थे और भौजाइयों के पैर छूकर आशीर्वाद ग्रहण करते थे, ताकि होली के हुड़दंग में यदि कोई चूक हो गयी हो तो छमा मिल जाये। इसी परम्परा और रीति का नाम ही था फगुआ।
समय परिवर्तन की इस दौड़ में देवरों की होली खेलना तो याद रहा, किन्तु भौजाइयां फगुआ की रिवाज निभाना भूल गयी। अबीर, गुलाल और टेसू के फूलों से होली खेलने वाले देवरों ने इतना विकास तो कर लिया कि कीमती रंग, इत्र, स्प्रे से खेलने लगे, लेकिन फगुआ के नाम पर मिठाई तो दूर चार बतासे भी अब नहीं दिखायी देते है। लोक गीत और लोक रीति के क्षेत्र में वृक्ष की परम्पराओं का अनूठा और बेमिसाल आनंद है। आज मिठास की इस अंधी दौड़ में न फाग गायन की परम्परा बची और न फगुआ का पवित्र संदेश प्रसारित हो पा रहा है। नई पीढ़ी के लिए किस्सा बनकर रहे गये फाग और फगुआ।

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