मोहम्मदाबाद, समृद्धि न्यूज। जय-जय रामकथा के नवम दिवस पर कथाव्यास ने अरण्यकांड की कथा एवं जयंत के मानभंग की कथा सुनाई। कथाव्यास ने कहा कि नारद जी के समझाने पर वह भगवान के पास आकर क्षमा मांगी है और भगवान ने उसे क्षमा किया है। यहां से प्रभु अत्रि अनुसुइया के आश्रम में आये है। दोनों अत्यंत प्रसन्न हुए है। माता अनुसुइया जी ने सीता जी को स्त्रीधर्म की बहुत सी बातें सिखाई है। यहां से प्रभु आगे बढ़े है और ऋषियों ने प्रभु को अस्थियों के ढेर को दिखाया और भगवान ने भुजाये उठाकर प्रतिज्ञा की कि मैं इस धरती को निसिचर हीन करूंगा महाराज ने सुपर्णखा के गूर एवं विनोदपूर्ण प्रसंग को सुनाया एवं गिद्धराज जटायु के मार्मिक प्रसंग को सुनाया। माता शबरी के प्रसंग को सुनाते हुए महाराज ने कहा कि शबरी सम्पूर्ण मानस में धैर्य व प्रतीक्षा की साक्षात प्रतिमूर्ति है एवं भगवान द्वारा शबरी को दिए गए नवधा भक्ति के उपदेश को सुनाया ततपश्चात हनुमान जी के माध्यम से सुग्रीव से भेंट हुई है। महाराज ने हनुमान जी की पावन कथा सुनाई। जिसे सुनकर सम्पूर्ण जनमानस भक्ति में सराबोर हो गया। हनुमान के माध्यम से सीता जी की खोज हुई है एवं नल, नील के सहयोग एवं समस्त वानरों के परिश्रम से समुद्र पार सेतु का निर्माण हुआ है। विभीषण जी की शरणागति हुई है। एवं लंका के भयानक रणांगण की कथा महाराज ने सुनाई। जिससे सभी श्रोता रोमांचित हो गए। भगवान के द्वारा रावण का उद्धार किया गया। विभीषण को लंका का राजपद दिया है एवं माता सीता को लेकर लखन जी सहित पुष्पक विमान से अयोध्या पुन: आगमन हुआ है। सारी अयोध्या ने भगवान का सवागत किया। पूरी अयोध्या रोशनी से जगमगायी। भगवान ने भारत जी को अपने हाथों से नहलाया है। वशिष्ठ जी ने भगवान का राज तिलक किया है। कथा में भगवान के राजतिलक की बधाईया गए जाने लगी सम्पूर्ण वातावरण भक्तिमय हो गया। कथा के यजमान मीरा देवी, शिवमोहन सिंह गौर, गौरव गुप्ता, हिमांशु गुप्ता, विपिन गुप्ता रहे।
रामकथा के 9वें दिन कथाव्यास ने अरण्यकांड व जयंत के मानभंग की सुनाई कथा
