इतिहास से कराया रुबरु, मंत्री ने संग्रहालय के शिलान्यास के लिए स्वीकृति प्रदान की
कंपिल, समृद्धि न्यूज। समाजसेवी ने प्रतिनिधि मंडल के साथ पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री से मुलाकात कर ऐतिहासिक पौराणिक नगरी के बारे में जानकारी दी। उन्होंने एतिहासिक नगरी में आवागमन के लिए सडक़ आदि व्यवस्थाएं कराने की मांग की।
नगर के जैन श्वेतांबर महासभा उत्तर प्रदेश के विमलनाथ स्वामी जैन श्वेतांबर मंदिर के मंत्री व समाजसेवी पुखराज डागा ने बुधवार दोपहर अपने प्रतिनिधि मंडल के साथ भारत सरकार के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री ठाकुर जयवीर सिंह से मुलाकात की। उन्होंने एतिहासिक नगरी कंपिल के इतिहास के बारे में मंत्री को विस्तृत रूप से जानकारी दी। उन्होंने बताया जैन धर्म का प्रमुख तीर्थ स्थल में तेरहवें तीर्थंकर भगवान विमलनाथ जैन के जन्मस्थली होने की वजह से प्रतिवर्ष पूरे भारत से लाखों लोग कंपिल आते हैं। मंदिर में प्रतिदिन दूरदराज देशों से आए यात्री भगवान विमलनाथ जी का दर्शन कर पुण्य प्राप्त करते हैं। जन्म के अलावा भगवान विमलनाथ के चारों कल्याणक गर्भ, जन्म, तप और ज्ञान कंपिल में सम्पन्न हुए। उन्होंने बताया प्राचीन समय में आयुर्वेद की शोध शाला कंपिल में थी। चरक ऋषि कंपिल के ही निवासी थे। चरक ऋषि कंपिल स्थित आयुर्वेद की शोधशाला के प्रमुख गुरु थे। इसलिए आयुर्वेद की चरक संहिता भी कंपिल में ही लिखी गई। ऐसा शास्त्रों में प्रमाणिक उल्लेख है। वर्तमान समय में भी एक शोधशाला खुलने पर कंपिल नगरी के लिए रामबाण साबित होगी। कंपिल क्षेत्र की जमीन में लाखों प्रकार की जड़ी बूटियों का भंडार है। ज्योतिष के विद्वान बारहमिहिर व गुरु द्रोणाचार्य ने कंपिल में अध्यात्म प्राप्त किया था। उन्होंने कंपिल नगरी में तीनों ऋषियों के आश्रम की मांग की। उन्होंने प्राचीन रामेश्वर नाथ मंदिर के आसपास सुंदर झील का निर्माण, जलथमन कुएं, द्रौपदी कुंड के जीर्णोद्धार की मांग रखी। मंदिर परिसर में क्षेत्र की खुदाई में निकली लाखों वर्षों पुरानी मूर्तियां रखी हुई हैं। जिसके लिए मंदिर परिसर में प्राचीन पांचाल पुरातत्व का निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा। पुरातत्व संग्रहालय के शिलान्यास हेतु मंत्री से समय निकालने का अनुरोध किया। मंत्री ने संग्रहालय के शिलान्यास के लिए स्वीकृति प्रदान की। सभी धर्मों के आने वाले पर्यटकों के लिए सडक़, गेस्ट हाउस आदि की भी मांग की। जैन श्वेतांबर मंदिर में भगवान विमलनाथजी की एक प्राचीन मूर्ति है जो गंगा नदी से प्राप्त की गई थी। यह वह पवित्र स्थान है। जहाँ लगभग 2590 वर्ष पहले भगवान महावीर जी ने मोक्ष प्राप्त किया था। इसके अलावा इस स्थान पर भगवान आदिनाथजी और भगवान पाश्र्वनाथजी के समवसरण की पवित्र उपस्थिति देखी गई है। यह महान द्रौपदी का जन्म स्थान और विवाह स्थल है। रामेश्वर नाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग के संबंध में पौराणिक मान्यता है कि यह वह त्र्यम्बक नामक शिवलिंग है जिसकी पूजा कर कुबेर धनाधीश हुए। बाद में रावण कुबेर को जीत कर इस शिव लिंग को पुष्पक विमान के साथ लंका ले गया और चंडीश्वर के नाम से इसकी पूजा कर त्रिलोक विजेता बना। लंका प्रवास के दौरान सीता जी अशोक वन में इस शिवलिंग की पूजा किया करती थीं। लंका विजय के बाद भगवान राम इसे अयोध्या ले आए थे। उन्होंने अपने अनुज शत्रुघ्न को लवणासुर का वध करने जाते समय इस शिवलिंग को पवित्र स्थल पर स्थापित करने को दिया था। शत्रुघ्न ने गंगातट कंपिल में इस शिवलिंग को स्थापित किया। इस कारण इसे उपज्योर्तिलिंग की मान्यता मिली तथा शिवलिंग के पूजन की महत्ता सेतुबंध रामेश्वरम में स्थापित शिवलिंग के बाद दूसरे स्थान की मिली।
ऐतिहासिक नगरी कंपिल को विकसित करने के लिए पर्यटन मंत्री से मिले पुखराज डागा
