फर्रुखाबाद, समृद्धि न्यूज। अपरा काशी में बसंत पंचमी के दिन पतंगबाजी देखने लायक होती थी। वह एक समय था जब हम विद्यालय से घर आते ही सीधे छत पर व पतंग बाजी प्रारम्भ कर देते थे और खाना पीना छत से उतरने के बाद होता था। बसंत पंचमी के हफ्ते भर पहले कोड़ी के हिसाब से पतंग खरीद ली जाती थीं। पतंगबाजी के समय ये काटा वो काटा का शोर दिन भर कानों में गूंजता था। चली च ली रे पतंग मेरी चली रे चली बादलों के पार हो के डोर पे सवार सारी दुनिया ये देख देख जली रे, न कोई उमंग है न कोई तरंग है मेरी जिंदगी क्या इक कटी पतंग है, यह फिल्मी गीत भी पतंगबाजी को एक अलग की स्थान देते हैं। सभी धर्म मिलकर छोटे, बड़े व बूड़े बसंत पर लगातार तीन दिन पतंग बाजी कर पूरा लुत्फ उठाते। बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की विशेष रूप से पूजा की जाती है, लेकिन पतंगबाजी का खेल अब धीरे-धीरे लुप्त होने के कगार पर पहुंच गया हैं। आधुनिक संचार क्रांति के युग में मोबाइल, फेसबुक व वाट्सएप और व्यस्त दिनचर्या ने पतंगबाजी के खेल से युवाओं का मोहभंग कर दिया है। दूसरी ओर चाइनीज बाजार ने पतंगबाजी के खेल पर भी कब्जा कर लिया। वहीं चायनीज मांझे से हुए हादसों के बाद बच्चों का इससे किनारा हो गया, हालांकि चायनीज मांझे पर रोक है, लेकिन बावजूद इसके यह चोरी छिपे बिक रहा है। पूर्व समय में लोग बड़े खुले मैदान व छतों से पतंग उड़ाकर जमकर लुप्त उठाते थे। बसंत पंचमी के मौके पर जनपद में खूब पतंग उड़ाई जाती थी, लेकिन अब दिन प्रतिदिन युवाओं के इस शौक को मोबाइल व सोशल मीडिया में दिलचस्पी ने पेंच फांस दिया है। पतंग उड़ाने को काफी युवा व बड़े खुले मैदान व छतों से पतंग उड़ाकर जमकर लुत्फ उठाते थे। हवा के झोकों के बीच पतंगबाजी का खेल बेहद शौक से हुआ करता था। एक दूसरे की पतंग काटकर युवा खुश हुआ करते थे। सालों पहले छोटे बच्चे प्लास्टिक की हल्की पन्नियों की खुद ब खुद पतंग बना लेते थे। देशी कारीगर कागज व प्लास्टिक की पतंग तैयार करते थे, जबकि कच्ची सूत को नीला थोथा, मोम आदि से पक्का कर मांझा तैयार कर लेते थे। अधिक तेज मांझा तैयार करने के लिए कांच का इस्तेमाल भी कर लिया जाता था, लेकिन इसे बड़े ही प्रयोग करते थे। आधुनिक दौर में धीरे-धीरे बढ़ी व्यस्तता और संचार क्रांति के युग में फेसबुक व वाट्सएप ने पतंगबाजी के खेल से युवाओं का मोहभंग कर दिया है। इंटरनेट मीडिया पर युवा पूरे दिन व्यस्त होने के कारण अब पतंग को भूलते जा रहें हैं। बसंत पंचमी को लेकर बाजार में तैयारी बंसत पंचमी को लेकर शहर के पतंगसाजो नें तैयारी की है। दुकानों पर पतंगों व चरखी का भंडारण किया है। फर्रुखाबाद से कागज की पतंग की मांग जयपुर व अहमदाबाद में बड़ी मात्रा में है। अधिकतर मांझा बरेली से आयात किया जाता है। शहर के पतंगसाज शिवकुमार ने बताया की मोबाइल के चक्कर में युवा पतंग को भूल रहे हैं। बाजार में 10 रूपये से लेकर लगभग 700 रूपये तक कीमत की चरखी है। 900 से 5500 मीटर का सफेद धागा बाजार में उपलब्ध है। कार्टून वाली पतंग बच्चे पसंद कर रहे हैं। दुकानों पर छोटा भीम, मोटू पतलू, डोरेमोन, स्पाइडरमैन आदि कार्टून वाली पतंगे पसंद बनी हैं।
सोशल मीडिया की लत से युवाओं का पतंगबाजी से हो रहा मोहभंग
