नई दिल्ली: देश के विभिन्न राज्यों में लागू धर्मांतरण विरोधी कानूनों की संवैधानिक वैधता पर अब सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आएगा। शीर्ष अदालत ने इन कानूनों को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को एक साथ जोड़ दिया है और मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे तीन जजों की विशेष बेंच को सौंपने का निर्णय लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार 2 फरवरी को धर्मांतरण रोधी कानूनों की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज इन इंडिया की नई याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट ने केंद्र के साथ-साथ राजस्थान और अरुणाचल प्रदेश सहित 12 राज्यों को नोटिस जारी किया। कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को अपने जवाबी हलफनामे दाखिल करने के लिए 4 हफ्ते का समय दिया है। सीनियर वकील मीनाक्षी अरोड़ा के जरिए दाखिल इस जनहित याचिका में धर्मांतरण रोधी कानूनों के क्रियान्वयन पर फौरन रोक लगाने का अनुरोध किया गया है। सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने एनसीसीआई की दलीलों पर संज्ञान लेते हुए केंद्र और 12 राज्य सरकारों से 4 हफ्ते के अंदर जवाब तलब किया। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के अलावा राजस्थान, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़, अरुणाचल प्रदेश, गुजरात, झारखंड, उत्तराखंड, हरियाणा, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश को भी नोटिस जारी किए। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 16 सितंबर 2025 को कई राज्यों द्वारा पारित धर्मांतरण रोधी कानूनों पर रोक लगाने का अनुरोध करने वाली याचिकाओं पर संबंधित राज्यों से जवाब तलब किया था। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ राज्य कानून ऐसे हैं जो धर्मांतरण के आरोप लगाने के लिए निगरानी समूहों को प्रोत्साहित करते हैं, जिससे कई झूठी शिकायतें दर्ज की जा रही हैं।
धर्मांतरण विरोधी कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट का केंद्र सहित 12 राज्यों को नोटिस
