फर्रुखाबाद, समृद्धि न्यूज। फर्रुखाबाद में वर्ष 1901 में जन्में कवि शम्भू दयाल सक्सेना ने बच्चों के लिए सुंदर लोरियां और नए-नए विषयों पर बाल कविताएं लिखीं थीं। उनकी पालना लोरी और प्रभाती, फूलों के गीत, नाचो गाओ, आ री निंदिया, रेशम झूला, दुपहरिया, बाल कवितावली आदि पुस्तकें प्रसिद्ध हैं।
समाजसेवी भूपेन्द्र प्रताप सिंह ने शम्भू दयाल सक्सेना के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि वह कविता प्रेमी थी और बच्चों से बहुत प्यार करते थे। बाल साहित्य की कवितायें लिखने के साथ-साथ वह फर्रुखाबाद व राजस्थान का महत्व भी दर्शातें थे। आजीविका के सिलसिले में शम्भू दयाल सक्सेना एक बार राजस्थान क्या गए वे वहीं के होकर रह गए। बच्चों के लेखन को समर्पित शम्भू दयाल सक्सेना ने आजीवन बाल साहित्य की सेवा की। इसे देखते हुए उनके नाम पर राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर द्वारा प्रति वर्ष राजस्थान निवासी बाल साहित्यकारों की श्रेष्ठ बाल साहित्यिक कृति के लिए शम्भू दयाल सक्सेना बाल पुरस्कार प्रदान किया जाता है। यह राजस्थान का सर्वाधिक प्रतिष्ठित बाल साहित्य पुरस्कार है। 15000 रुपए की राशि का यह पुरस्कार विगत तीन वर्षों में प्रकाशित सर्वश्रेष्ठ बाल पुस्तक पर दिया जाता है।
वर्तमान में चर्चित अनेक बाल साहित्यकारों को यह प्रतिष्ठित बाल पुरस्कार मिल चुका है। शम्भू दयाल सक्सेना के साहित्यिक योगदान को देखते हुए अक्टूबर 2013 में बीकानेर नगर निगम ने बीकानेर के फड़़ बाजार में उनके नाम पर एक सडक़ का नाम भी शम्भूदयाल सक्सेना मार्ग रखा है। उनके जन्म के ठीक छह दशक बाद उत्तर प्रदेश के इसी फर्रुखाबाद जनपद में जन्में बाल साहित्यकार रजनीकान्त शुक्ल ने भी इसी राजस्थान में बाल साहित्य के क्षेत्र में बड़ा काम किया है। अब पूरे राजस्थान में कक्षा पांच में पढऩे वाले बच्चे रजनीकान्त शुक्ल की लिखी कहानी राजस्थान के बालवीर पढ़ेंगे। राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद उदयपुर द्वारा तैयार की गई और राजस्थान राज्य पाठ्य-पुस्तक मण्डल जयपुर द्वारा प्रकाशित कक्षा पांच की पाठ्य-पुस्तक हिन्दी सुमन भाग-तीन में पांचवें पाठ के रूप में राजस्थान के बालवीर पाठ को अब से समूचे राजस्थान के बच्चे पढ़ेंगे। यह जनपद के समस्त निवासियों के लिए हर्ष का विषय है कि यहां के बजरिया मोहल्ले में जन्मे बाल साहित्यकार को इतने बड़े स्तर पर मान्यता मिली उससे भी बड़ी बात है कि उनकी लिखी कहानियां अपने उद्देश्य को सार्थक करते हुए देश की नयी पीढ़ी में त्याग बलिदान हिम्मत और साहस के भाव भरेंगी। मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के साथ रजनीकान्त शुक्ल के लिखे पाठ को भी बच्चे अपनी पाठ्य-पुस्तक में पढ़ेंगे यह जनपद के लिए अत्यन्त प्रसन्नता का विषय है। मशहूर शायर साहिर लुधियानवी ने लिखा था कि कल और आएंगे नगमों की खिलती कलियां चुननेवाले, मुझसे बेहतर कहने वाले तुमसे बेहतर सुनने वाले। अगर इस दृष्टिकोण से देखें तो रजनीकान्त शुक्ल की यह उपलब्धि एक कदम बढक़र है। क्योंकि शम्भू दयाल सक्सेना ने यह शोहरत राजस्थान में जाकर वहां रहकर अर्जित की थी और उनके नाम का पुरस्कार बच्चों के लिए लिखने वाले राजस्थान के साहित्यकारों को दिया जाता है, जबकि बाल साहित्यकार रजनीकान्त शुक्ल का बाल लेखन बच्चों के पाठ्यक्रम के माध्यम से अब सीधे नयी पीढ़ी से साक्षात्कार कर रहा है। उनकी रचनायें देश-विदेश में भी लोकप्रिय हो चुकी है।
शंभूदयाल सक्सेना की सुंदर लोरियां व बाल कवितायें बच्चों को आज भी प्रिय
