समृद्धि न्यूज। जैसलमेर के फतेहगढ़ स्थित मेघा गांव में जुरासिक काल के फाइटोसौर प्रजाति का जीवाश्म (फॉसिल) मिला है। वैज्ञानिकों का दावा है कि यह जीवाश्म करीब 20 करोड़ साल पुराना है। ये डायनासोर से भी पुराना है। उन्होंने इसे देश में जुरासिक काल की चट्टानों से फाइटोसौर जीवाश्म की पहली खोज बताया है। कंकाल जहां मिला है, उस क्षेत्र को संरक्षित दायरे में लिया गया है, अब कंकाल की पूरी खोज जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया करेगा।
20 करोड़ साल पहले राजस्थान में क्या था और वह कैसा दिखता था…. क्या वहां पर पानी था या फिर दूर-दूर तक सिर्फ रेतीला रेगिस्तान था। ऐसे न जानें कितने सवाल आपके दिमाग में आते होंगे और आप भी कभी कभी इसका जवाब तलाशने की कोशिशें करते होंगे. अगर अब तक आपको ये जवाब नहीं मिले हैं तो आने वाले समय में मिल सकते हैं। वरिष्ठ भूजल वैज्ञानिक डॉ0 नारायणदास इणखिया की मौजूदगी में जयनारायण व्यास यूनिवर्सिटी (जेएनवीयू), जोधपुर के भूविज्ञान विभाग के पृथ्वी प्रणाली विज्ञान संकाय के डीन डॉ0 वीएस0 परिहार के नेतृत्व में एक टीम फिलहाल फॉसिल को लेकर अध्ययन कर रही है।
जैसलमेर के मेघा गांव में मिला डायनासोर के जीवाश्म की पहचान वैज्ञानिकों ने फाइटोसॉर के तौर पर की है। यह भारत के लिए बेहद रोमांचक खोज है क्योंकि देश में पहली बार किसी फाइटोसॉर का इतनी अच्छी तरह संरक्षित जीवाश्म मिला है। साल 2023 में बिहार-मध्यप्रदेश की सीमा पर फाइटोसॉर की एक किस्म का जीवाश्म मिला था। वहीं वैज्ञानिकों का कहना है कि जैसलमेर का यह जीवाश्म भारत में पहला पक्का और संरक्षित फाइटोसॉर जीवाश्म है। इससे यह पता लगता है कि करोड़ों साल पहले थार मरुस्थल का यह क्षेत्र जलीय जीवन से भरपूर रहा होगा। लगभग डेढ़ से दो मीटर लंबा यह जीवाश्म पास में मिले एक अंडे के साथ मिला है। इससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि यह अंडा भी उसी सरीसृप का हो सकता है। मौके पर गए वज्ञानिकों का कहना था की ऐसा लग रहा था की ये फाइटोसॉर अंडे को अपने बगल में दबा के बैठा है। भूवैज्ञानिक डॉ0 नारायण दास इनाखिया ने कहा, इस फाइटोसॉर की खोज के साथ जैसलमेर अब देश में सबसे बड़े और व्यापक जीवाश्म स्थलों में शामिल हो गया है।
बताते चले कि मेघा गांव के ग्रामीणों ने 21 अगस्त को इस कंकाल की जानकारी प्रशासन को दी थी। जिले के वरिष्ठ भूजल वैज्ञानिक डॉ0 एनडी इणखिया मौके पर पहुंचे और रिसर्च शुरू की। उन्होंने ये जुरासिक काल का फॉसिल होने की बात कही। इसके बाद विशेषज्ञ के रूप मे डॉ0 परिहार ने निरीक्षण कर फॉसिल की पुष्टि की। डॉ0 परिहार ने इसे 201 मिलियन वर्ष (करीब 20 करोड़ साल) पुराना घने जंगलों में पाए जाने वाले वृक्ष छिपकली (फाइटोसौर) मगरमच्छ प्रजाति का जीवाश्म बताया। इसकी लंबाई 1.5 से 2 मीटर है। रिसर्च में सामने आया कि फाइटोसौर (वृक्ष छिपकली) एक प्राचीन सरीसृप है, जो नदियों के पास जंगलों में रहता था। ट्राइऐसिक पीरियड 251.9 से 201.4 मिलियन वर्ष पहले तक चला था। यह पीरियड पर्मियन ट्राइऐसिक विलुप्ति के बाद शुरू हुआ इसमें धरती पर जीवन की भारी क्षति हुई थी। इसी दौर में डायनासोर, कछुए, छिपकली समेत विभिन्न स्तनधारी जीव पैदा हुए थे। इस दौर में पेंजिया नामक एक ही महाद्वीप था और विभिन्न प्रकार के जीव, विशेष रूप से सरीसृपों की उत्पत्ति हुई थी। फिलहाल, मेघा गांव के तालाब के पास मिले इस कंकाल के चारों तरफ तारबंदी कर इसे सुरक्षित किया गया है। उन्होंने बताया जैसलमेर शहर में जेठवाई की पहाड़ी है। यहां से 16 किलोमीटर दूर थईयात और लाठी को डायनासोर का गांव कहा जाता है। इसकी वजह है कि इन जगहों पर ही डायनासोर होने के प्रमाण मिलते हैं। जेठवाई पहाड़ी पर पहले माइनिंग होती थी। लोग घर बनाने के लिए यहां से पत्थर लेकर जाते थे। ऐसे ही थईयात और लाठी गांव में सेंड स्टोन के माइनिंग एरिया में डायनासोर के जीवाश्म मिलते हैं। तीनों गांवों में ही माइनिंग से काफी सारे अवशेष तो नष्ट हो गए थे। जब यहां डायनासोर के जीवाश्म मिलने लगे तो सरकार ने माइनिंग का काम रुकवा दिया, अब तीनों जगहों को संरक्षित कर दिया गया है।
डायनासोर से भी पहले का जैसलमेर में मिला 20 करोड़ साल पुराना जीवाश्म
