पक्षी ने भारत से 6 हजार किलोमीटर तय कर केन्या पहुंचे, बिना रुके 6 दिन में सफर किया तय

समृद्धि न्यूज। लगातार छह दिनों तक ये डिवाइस उनकी हर गतिविधि को सैटेलाइट के जरिये रिकॉर्ड करते रहे। इन्हें टैग करने का उद्देश्य ये समझना था कि अमूर फाल्कन आखिर किन रास्तों से गुजरते, कितनी ऊंचाई पर उड़ते और कब-कब आराम करते हैं मणिपुर के जंगलों से टैग किए गए तीन अमूर फाल्कन ने इस साल भी अपनी माइग्रेशन उड़ान से दुनिया के पक्षी वैज्ञानिकों को चौंका दिया है। महज 150 ग्राम वजन वाले इन छोटे परिंदों ने महाद्वीपों को पार करते हुए 6 दिन में 6 हजार किलोमीटर की दूरी तय की है। इस उड़ान में तीन अमूर फाल्कन शामिल थे-अपापांग (नर), अलंग (मादा) और आहू (मादा) तीनों ने इस उड़ान से साबित कर दिया कि अमूर फाल्कन दुनिया के सबसे सहनशील और लंबी दूरी तय करने वाले पक्षियों में से एक है। लगातार छह दिनों तक ये डिवाइस उनकी हर गतिविधि को सैटेलाइट के जरिये रिकॉर्ड करते रहे। इन्हें टैग करने का उद्देश्य ये समझना था कि अमूर फाल्कन आखिर किन रास्तों से गुजरते, कितनी ऊंचाई पर उड़ते और कब-कब आराम करते हैं। तीनों पक्षियों की यात्रा का सबसे कठिन हिस्सा अरब सागर था। जहां इंसान जहाज के साथ भी जाने से डरता है, लेकिन छोटे मगर मजबूत पंक्षी वहां बिना किसी रुकावट के उड़ते चले गए। पहले पंक्षी अपापंग लंबी उड़ान के बाद केन्या पहुंचा। आहू ने सोमालिया में सुरक्षित लैंडिंग की और अलांग ने भी उसी मुश्किल रास्ते को चुनकर सफलतापूर्वक समुंद्र पार किया। इनकी इस यात्रा की खास बात यह है कि तीनों ने 3,000 किलोमीटर से भी लंबे खुले समुंद्र को एक ही बार में पार कर लिया। वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह किसी भी पक्षी के लिए दुनिया की सबसे कठिन माइग्रेशन फ्लाइट्स में से एक है। बताया गया कि ऑरेंज टैग वाला अपापांग इस बार सबसे आगे रहा। उसने 6 दिन 8 घंटे में 6,100 किलोमीटर की नॉन-स्टॉप उड़ान भरी। यह सफर पूर्वोत्तर भारत से अरब सागर और अफ्रीका के हॉर्न को पार करते हुए सीधे केन्या में जाकर खत्म किया। इतनी लंबी उड़ान बिना रुके छोटे आकार वाले किसी भी शिकारी पक्षी के लिए दुनिया की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। वहीं येलो टैग वाली अलंग, जो इन तीनों में सबसे युवा है। उसने भी कमाल की उड़ान भरी। अलंग ने 6 दिन 14 घंटे में 5,600 किलोमीटर का रास्ता तय किया। रास्ते में उसने तेलंगाना में एक रात और महाराष्ट्र में करीब तीन घंटे का छोटा रेस्ट लिया। फिर सीधे समुद्र पार करते हुए केन्या पहुंच गई। पहली बार माइग्रेशन कर रही इस चिडिय़ा के लिए यह क्षमता आश्चर्यजनक मानी जा रही है। तथा रेड टैग वाली आहू ने उत्तरी रास्ता चुना। वह पहले पश्चिमी बांग्लादेश में रुकी और फिर अरब सागर को पार करते हुए 5,100 किलोमीटर की दूरी 5 दिन 14 घंटे में तय कर उत्तरी सोमालिया के पास पहुंच चुकी है। एक्सपर्ट का मानना है कि वह जल्द ही अपने दोनों साथियों से मिलकर केन्या के त्सावो नेशनल पार्क की ओर बढ़ेगी। वहीं आईसीएआर और केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीएमएफआरआई) के वैज्ञानिकों ने अरब सागर में गहरे समुद्र के ऑक्टोपस स्क्विड (अष्टबाहु) की एक नई प्रजाति की खोज की है। यह खोज विश्व स्तर पर दुर्लभ माने जाने वाले टैनिंगिया वंश की दूसरी प्रजाति है। सीएमएफआरआई ने शुक्रवार को बताया बताया कि इस प्रजाति का वैज्ञानिक नाम टैनिंगिया सिलासी (इंडियन ऑक्टोपस स्क्विड) रखा गया है। इसका औपचारिक विवरण अंतरराष्ट्रीय जर्नल मरीन बायोडायवर्सिटी में प्रकाशित किया गया है।

 

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