हरदोई से संतोष तिवारी की रिपोर्ट
हरदोई, समृद्धि न्यूज। हर साल शरद ऋतु शुरू होते ही देश में प्रदूषण पर बहस तेज हो जाती है।हवा की गुणवत्ता गिरते ही सरकारें और एजेंसियाँ सबसे पहले किसानों को निशाने पर लेती हैं। पराली जलाने की घटनाओं को प्रदूषण का मुख्य कारण बताया जाता है।जबकि किसान वर्ग लगातार सवाल उठाता है कि औद्योगिक इकाइयों,ईंट भट्टों,चीनी मिलों,गन्ने के कोल्हों और छोटे-बड़े कारखानों से निकलने वाले धुएँ पर उतनी सख्ती क्यों नहीं होती,जितनी एक गरीब किसान पर?
किसानों का तर्क है कि वह देश का सबसे मेहनत कश और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग हैं। खेती उनकी मजबूरी है,और पराली जलाना कई बार परिस्थितियों की देन बन जाता है।धान की फसल कटते ही अगली बुवाई का समय बेहद कम बचता है। ऐसे में पराली को खेत से हटाने के लिए आधुनिक मशीनें हर किसान की पहुँच से दूर हैं।सरकार भले ही मशीनों की बात करती है,लेकिन ज़मीन पर उनकी उपलब्धता सीमित है और किराया भी छोटा किसान वहन नहीं कर पाता।
दूसरी ओर किसानों का यह भी आरोप है कि बड़े उद्योगों द्वारा उत्सर्जित धुआँ,ईंट भट्टों का धूल-धुआँ,गन्ने के कोल्हू और चीनी मिलों की चिमनियों से निकलने वाली कालिख,फैक्टरियों में बिना मानक उपकरणों के चल रही उत्पादन प्रक्रिया भी हवा में भारी प्रदूषण बढ़ाती है।किसानों को लगता है कि शासन-प्रशासन प्रदूषण की जड़ को पहचानने के बजाय उस वर्ग को जिम्मेदार ठहराता है जिसकी आवाज़ सबसे कमजोर है।
विशेषज्ञों के अनुसार,पराली प्रदूषण का योगदान है—लेकिन यह संपूर्ण प्रदूषण में एक सीमित हिस्सा है। इसके अलावा निर्माण कार्यों से उड़ती धूल,वाहन उत्सर्जन,कोयले से चलने वाले उद्योग,विद्युत संयंत्र और बढ़ता शहरी विस्तार भी हवा की गुणवत्ता खराब करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। सवाल उठता है कि जब प्रदूषण के इतने बड़े स्रोत मौजूद हैं,तो केवल खेतों से उठता धुआँ ही सरकारी एजेंडे का केंद्र क्यों बनता है?
किसानों का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में पराली समस्या को खत्म करना चाहती है तो उसे आधुनिक मशीनें मुफ्त या कम कीमत पर उपलब्ध करानी होंगी, पराली आधारित उद्योगों को बढ़ावा देना होगा,और वैकल्पिक उपयोग जैसे पशु आहार,बायोफ्यूल, बायो-कोयला उत्पादन को बढ़ाने के लिए ठोस नीतियाँ बनानी होंगी। केवल जुर्माना,चेतावनी और दंड से समस्या का समाधान संभव नहीं है।
कुल मिलाकर पराली मुद्दा केवल किसान का नहीं,बल्कि नीति और प्रबंधन की कमी का परिणाम है। किसान प्रश्न उठाते हैं—क्या प्रदूषण पर कार्रवाई में समानता होगी? क्या उद्योगों और बड़े प्रदूषण स्रोतों पर भी उतनी ही सख्ती दिखाई जाएगी? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते,तब तक पराली को लेकर किसानों की नाराज़गी और सरकार की चिंता दोनों बनी रहेंगी।
