
राजेपुर, समृद्धि न्यूज। जी हां ये सच ही है साबिर लुधियानवी के ये शब्द सच साबित हो रहे है, जहां बड़ी आबादी के बाढ़ ग्रस्त होने के बाबजूद भी पीडि़तों में भी अपने पराये का भेदभाव हो रहा है, प्रधान से लेकर लेखपाल और जनप्रतिनिधियों एवं अधिकारियों द्वारा इस व्यवस्था में पूर्ण सहयोग किया जा रहा है वो आंख बंद करके बाढ़ राहत के पैकेट बाट कर सिर्फ राहत के नाम आंकड़े बढ़ा रहे है, जबकि जमीनी हकीकत बहुत अलग है।
गंगा नदी में आए दिन छोड़े जा रहे नरौरा बांध से पानी की वजह से कस्बा राजेपुर तहसील अमृतपुर क्षेत्र के तकरीबन 25 गांव का जिला मुख्यालय से संपर्क टूट चुका है। भले ही गंगा नदी का जलस्तर कम होने के बाद ग्रामीणों ने भले ही राहत की सांस ली हो, लेकिन ग्रामीणों के जीविका के साधन खत्म हो गए हैं। ऐसी स्थिति में ग्रामीण शासन द्वारा बाढ़ पीडि़तों को खाद्य सामग्री मुहैया कराए जाने की आस लगाए थे। कस्बा राजेपुर में बाढ़ पीडि़तों को 275 परिजनों को खाद्य सामग्री वितरण की गई, जबकि कस्बा राजेपुर में लगभग 1000 गृह स्वामी के सापेक्ष 275 परिजनों को बढ़ रह सामग्री किट वितरित की गई। लोगों का कहना है कि गांव मुखिया सहित लेखपाल ने सामग्री वितरण का सही आकलन नहीं किया। जिससे ग्रामीण शासन द्वारा बाढ़ पीडि़त के परिजनों को दी जाने वाली सहायता से वंचित रह गए। ग्रामीणों का आरोप है कि गांव के मुखिया व लेखपाल की मिली भगत से पत्रों को वंचित कर अपात्र को लाभ दिया गया। यहां पर यह लाइन सही सटीक बैठती है अपनों पर करम गैरों पर सितम, जान जफा ये जुल्म न कर।
