कानपुर, समृद्धि न्यूज। कानपुर में दस साल पहले हुए ईशा हत्याकांड में पूर्व दारोगा ज्ञानेंद्र सिंह को न्यायाधीश ने उम्रकैद की सजा सुनाई है। ज्ञानेंद्र ने पहली पत्नी के होते हुए ईशा से प्रेम विवाह किया और बाद में उसकी हत्या कर दी। अदालत ने इस मामले में अन्य आरोपितों को बरी कर दिया। पुलिस ने कौशांबी में ईशा का शव बरामद किया था, जिसके बाद ज्ञानेंद्र को गिरफ्तार किया गया था।
बताते चले कि कानपुर में 2015 के चर्चित ईशा हत्याकांड में दोषी ठहराए गए पूर्व दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह को विशेष न्यायाधीश शुचि श्रीवास्तव ने आजीवन कारावास और 50,000 रुपये के जुर्माने की सजा दी। वहीं, मामले में शामिल अन्य पांच आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। इस फैसले से पीडि़ता ईशा सचान के परिवार को 10 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद न्याय मिला है, जो पुलिसकर्मी की क्रूरता और धोखे की एक दर्दनाक कहानी को उजागर करता है। सनसनीखेज वारदात को अंजाम दिया गया उस समय दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह कानपुर के थाना किदवई नगर की साकेत नगर चौकी का इंचार्ज था और शहर में काफी चर्चित दरोगाओं में इसकी गिनती होती थी। काकादेव के नवीन नगर निवासी विनीता सचान ने 18 मई 2015 को काकादेव थाने में बेटी ईशा सिंह के अपहरण का मुकदमा दर्ज कराया। तहरीर में कहा गया कि ईशा सिंह का विवाह तत्कालीन मूसा नगर थानाध्यक्ष ज्ञानेन्द्र सिंह निवासी चित्रकूट के साथ 10 मार्च 2013 को हुआ था। विवाह के बाद ईशा ने एक पुत्री को जन्म दिया। बेटी के जन्म के कुछ समय बाद ईशा को मालूम पड़ा कि ज्ञानेन्द्र सिंह पहले से शादीशुदा है। इस बात को लेकर दोनों में झगड़ा होने लगा। इसके बाद ज्ञानेंद्र बेटी को मारने पीटने लगा। 17 मई 2015 को दोनों में समझौता करा दिया। 18 मई को दोपहर बाद तीन बजे ज्ञानेन्द्र सिंह आया और ईशा को मुक्ता देवी मन्दिर के दर्शन कराने के बहाने उनकी ही कार मांगकर ले गया। रात आठ बजे तक जब दोनों वापस नहीं लौटे तो उन्होंने ज्ञानेंद्र के मोबाइल पर फोन किया। बेटी व ज्ञानेंद्र दोनों के मोबाइल बंद थे। जिस समय यह घटना हुई, उस वक्त ज्ञानेन्द्र सिंह की पोस्टिंग प्रतापगढ़ में थी। पुलिस ने जब जांच शुरू की तो सामने आया कि ज्ञानेंद्र सिंह ने अपने साथियों मनीष कठेरिया निवासी यू ब्लाक निराला नगर, अर्जुन सिंह निवासी जूही बरादेवी, अवंतिका निवासी जूही बरादेवी, आदर्श कुमार सविता निवासी दामोदर नगर और विकास कठेरिया निवासी निराला नगर के साथ मिलकर ईशा को मार डाला है। मनीष ट्रेवल एजेंसी संचालक था और विकास उसका भाई है। पुलिस ने कौशांबी के महेवा घाट में सिर कटी लाश बरामद की थी, जिसमें हाथ के टैटू, उंगली में बंधी पट्टी, हाथ घड़ी व जेवरात से शव की पहचान ईशा के रूप में की गई थी। उन्होंने बताया कि जिस वक्त ज्ञानेंद्र कौशांबी में गंगा में फेंककर शव को ठिकाने लगाने की तैयारी कर रहा था, उसी वक्त वहां पर अन्य गाडिय़ां आ गईं थी। डरकर ज्ञानेंद्र सिर कटी लाश वहीं छोडक़र भाग गया और कार सवारों की सूचना पर शव बरामद हो गया। जांच में पता चला कि तत्कालीन दरोगा ज्ञानेंद्र ने अपने उन्ही साथियों के साथ सबूत मिटाने की कोशिश की, लेकिन वैज्ञानिक सबूतों और गवाहों के बयानों से उसका अपराध साबित हो गया और उसे जेल भेज दिया गया था। अभियोजन पक्ष ने अदालत में कुल 11 गवाह पेश किए, जिनमें ईशा के परिवार के सदस्य, पुलिस अधिकारी और फॉरेंसिक विशेषज्ञ शामिल थे। गवाहों के बयानों, वैज्ञानिक सबूतों और परिस्थितिजन्य प्रमाणों के आधार पर अदालत ने ज्ञानेंद्र को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) और 201 (सबूत मिटाने) के तहत दोषी ठहराया। विशेष न्यायाधीश शुचि श्रीवास्तव ने अभियुक्त ज्ञानेन्द्र को आजीवन कारावास और 50,000 रुपये के जुर्माने की सजा से दंडित किया। वहीं अन्य पांच आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत न होने के कारण उन्हें बरी कर दिया गया। बताया गया कि पुलिस आज तक ईशा का सिर बरामद तक नहीं कर पायी।
ईशा हत्याकाण्ड: दूसरी पत्नी की हत्या करने वाले पूर्व दारोगा को उम्रकैद
