कंपिल, समृद्धि न्यूज। गंगा किनारे बसे बाढ़ प्रभावित गांवों में इस बार भी बच्चों की पढ़ाई सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही है। प्राथमिक से जूनियर तक के स्कूलों में महीनों तक पानी भरे रहने से ताले लटक जाते हैं। बच्चे घरों में कैद होकर वक्त गुजारते हैं, जबकि पाठ्यक्रम और परीक्षाओं में पिछड़ते जा रहे हैं।
निजी स्कूलों की मनमानी
जिन बच्चों का दाखिला कस्बा या शहर के निजी स्कूलों में हैं उनका हाल भी अलग नहीं। बाढ़ के कारण रास्ते बंद हो जाते हैं। नावें चलना मुश्किल हो जाता है और स्कूल पहुँचना नामुमकिन। इसके बावजूद स्कूल प्रबंधन पूरा शुल्क वसूल करेगा।
डिजिटल पढ़ाई से दूर ग्रामीण
आज के डिजिटल युग में शहरों के बच्चे ऑनलाइन स्टडी से पढ़ाई जारी रखे हुए हैं, लेकिन गाँवों में न इंटरनेट की सुविधा है और न ही बच्चों के पास स्मार्टफोन। ऐसे में ग्रामीण छात्रों की पढ़ाई पूरी तरह ठप हो जाती है। हमीरपुर मजरा जात गांव के अभिभावक अनिल कुमार ने कहा बाढ़ से बेटा स्कूल नहीं जा पा रहा। ऑनलाइन क्लासेस यहाँ होती ही नहीं। फिर भी स्कूल कहता है फीस जमा करो, तभी पढ़ाई होगी।
शिक्षा विभाग पर सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि सरकार और शिक्षा विभाग को बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए वैकल्पिक इंतजाम करने चाहिए। अस्थायी शिक्षण केंद्र खोले जाएं, ताकि बच्चों का भविष्य अंधेरे में न डूबे। इकलहरा गांव के अरविंद बोले हर साल यही हाल होता है। शहरों में बच्चे ऑनलाइन पढ़ते रहते हैं, लेकिन हमारे बच्चे पिछड़ जाते हैं। सरकार राहत सामग्री तो देती है, लेकिन शिक्षा पर कोई ध्यान नहीं।
बच्चों का भविष्य अधर में
ग्रामीण इलाकों के गरीब बच्चे शिक्षा से वंचित हैं, वहीं निजी विद्यालयों की फीस वसूली मध्यम वर्गीय परिवारों पर दोहरी मार डाल रही है। डिजिटल शिक्षा के दौर में भी गांव के बच्चे पढ़ाई से महरूम हैं। जो शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना बन गई है।
