दहेज हत्या में पति को दस वर्ष का कारावास व 20 हजार का अर्थदंड

मुकदमा विचारण के दौरान बाबा, दादी, पिता की हो गयी थी मौत
साक्ष्य व गवाह के आधार सास दोषमुक्त

फर्रुखाबाद, समृद्धि न्यूज। दहेज हत्या के मामले में अपर न्यायाधीश विष्णु चंद्र वैश्य ने आरोपी पति अनिल कुमार को दोषी करार देते हुए १० वर्ष का कारावास व २० हजार रुपये के अर्थदंड से दंडित किया। वहीं मुकदमा विचारण के दौरान अभियुक्त के बाबा चंद्रपाल, दादी लीलावती, पिता नरेंद्र की मृत्यु हो गई। मां मुन्नी देवी को साक्ष्य के आभाव में दोषमुक्त कर दिया गया।विगत वर्ष ३० अगस्त १९९० को उमेश प्रताप सिंह पुत्र कन्हैया वक्स निवासी सिलवारी थाना लुनार जनपद हरदोई ने दर्ज कराये मुकदमे में दर्शाया कि उसने अपनी बहन ऊषा का विवाह अनिल कुमार पुत्र नरेन्द्र सिंह निवासी थाना राजेपुर के ग्राम गांधी के साथ वर्ष १९८९ को किया था। शादी के बाद से ही ससुरालीजन पति अनिल कुमार, ससुर नरेन्द्र सिंह, पति के बाबा चन्द्रपाल, दादी लीलावती, सास मुन्नीदेवी अतिरिक्त दहेज में बाइक की मांग करने लगे। मना करने पर मेरी बहन का उत्पीडऩ शुरु कर दिया। २९ अगस्त को रात्रि १२ बजे चन्द्रपाल ने सूचना दी कि तुम्हारी बहन ऊषादेवी की तबियत ज्यादा खराब है उसे कालरा हो गया है। सूचना पर मैं व मेरे बाबा विजराज सिंह बहन के घर गांधी गये तो देखा कि मेरी मरी बहन पड़ी थी और वह जली हुई थी। पीडि़त ने बहन के ससुरालियों पर दहेज में बाइक न मिलने के कारण जलाकर मार डालने का आरोप लगाया था। पुलिस ने ३० अगस्त १९९० को मुकदमा दर्ज कर आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल कर दिया था। बचाव पक्ष व जिला शासकीय अधिवक्ता की कुशल पैरवी के आधार पर अपर न्यायाधीश विष्णु चंद्र वैश्य ने आरोपी पति अनिल कुमार को दोषी करार देते हुए धारा ४९८ए में तीन वर्ष के सश्रम कारावास व १५ हजार रुपये के अर्थदंड से दंडित किया। अदा न करने पर तीन माह का साधारण कारावास भुगतना होगा। धारा ३०४बी में दस वर्ष के कारावास से दंडित किया। धारा ३/४ में दो वर्ष के सश्रम कारावास व पांच हजार रुपये के अर्थदंड से दंडित किया। अदा न करने पर दो माह का अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा। अभियुक्त सभी सजाये साथ-साथ चलेगी। अभियुक्त द्वारा जेल में बितायी गई अवधि को सजा में समायोजित की जायेगी। वहीं मुकदमा विचारण के दौरान आरोपी के बाबा चंद्रपाल, दादी लीलावती, पिता नरेंद्र की मृत्यु हो गई। सास मुन्नी देवी को पर्याप्त साक्ष्य न होने के चलते दोषमुक्त कर दिया गया।

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