कौशाम्बी के चरवा चायल में मृत्युभोज प्रथा पर लगा प्रतिबंध: डा0 रामकरन निर्मल

धोबी व अन्य समाजों की अनूठी पहल
कौशाम्बी, समृद्धि न्यूज। राधे लाल जी की स्मृति में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में डॉ0 राम करन निर्मल ने कहा कि में बहुजन महापुरुष एवं श्रद्धेय नेता के त्याग एवं संघर्ष से प्रेरणा लेकर मृत्युभोज जैसी रूढिग़त परंपराओं की समीक्षा करते हुए उसके स्थान पर मानवीय संवेदना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामाजिक चेतना पर आधारित विकल्प अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
डॉ0 राम करन निर्मल ने कहा कि मृत्यु जीवन का अटल सत्य है और किसी प्रियजन को खोने का दु:ख स्वाभाविक है। ऐसे समय में शोकाकुल परिवार को सामाजिक सहयोग, संवेदना और सांत्वना की आवश्यकता होती है, न कि अतिरिक्त आर्थिक बोझ और सामाजिक दबाव की। मृत व्यक्ति के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने के लिए अनावश्यक खर्च, दिखावे और रूढिग़त परंपराओं का पालन अनिवार्य नहीं होना चाहिए।उन्होंने कहा कि तथागत गौतम बुद्ध की करुणा, प्रज्ञा और मैत्री की शिक्षाएँ तथा भारत रत्न डा0 भीमराव आंबेडकर के समानता, शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन के विचार हमें विवेकपूर्ण एवं प्रगतिशील समाज के निर्माण की प्रेरणा देते हैं। समाज को ऐसी परंपराओं पर विचार करना चाहिए, जिनके कारण कई बार परिवारों को अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करना पड़ता है। डॉ0 निर्मल ने कहा कि परंपराओं का सम्मान करना और उनमें समयानुकूल सुधार करना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। किसी परंपरा का लंबे समय से प्रचलित होना ही उसकी अनिवार्यता का प्रमाण नहीं हो सकता। प्रत्येक सामाजिक प्रथा को मानवीय गरिमा, तार्किकता और समाज के हित की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि शोकसभा के माध्यम से दिवंगत व्यक्ति को श्रद्धांजलि देना, उनके जीवन से प्रेरणा लेना तथा जरूरतमंदों की सहायता, बच्चों की शिक्षा और जनकल्याण के कार्यों को बढ़ावा देना समाज के लिए सार्थक पहल हो सकती है। किसी परिवार पर किसी विशेष प्रकार के आयोजन या भोज का दबाव नहीं होना चाहिए। प्रत्येक परिवार को अपनी परिस्थितियों और विवेक के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि डॉ0 आंबेडकर के विचार हमें शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्ध होने का संदेश देते हैं, जबकि बुद्ध का दर्शन करुणा, विवेक और मानवीय व्यवहार का मार्ग प्रशस्त करता है। इन विचारों को वास्तविक जीवन में अपनाना ही सामाजिक परिवर्तन की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है।
डॉ0 राम करन निर्मल ने कहा कि समाज में वास्तविक परिवर्तन तभी संभव है, जब हम केवल रूढिय़ों की आलोचना करने तक सीमित न रहें, बल्कि उनके स्थान पर सकारात्मक और मानवीय विकल्प भी प्रस्तुत करें। मृत्यु के अवसर पर अनावश्यक खर्च और सामाजिक दिखावे के बजाय परिजनों को सहयोग देना, जरूरतमंदों की मदद करना तथा शिक्षा एवं जागरूकता को प्रोत्साहित करना अधिक सार्थक दृष्टिकोण है। उन्होंने श्रद्धेय राधे लाल जी को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि दिवंगत व्यक्ति की स्मृति को सम्मान देने का सार्थक तरीका यह भी है कि हम उनके जाने के बाद समाज में करुणा, समानता, वैज्ञानिक चेतना और मानवीय मूल्यों को मजबूत करने का संकल्प लें।उन्होंने आह्वान किया कि समाज को अंधानुकरण के स्थान पर विवेकए दिखावे के स्थान पर संवेदना और अनावश्यक खर्च के स्थान पर जनकल्याण को प्राथमिकता देनी चाहिए। सांसद नरेश उत्तम पटेल ने पुष्पांजलि अर्पित करते हुए कहा कि डा0 निर्मल जी के पिता जी बेहद सामाजिक और पारिवारिक व्यक्ति थे उन्होंने समाज में फैली कुरीतियों का विरोध किया। और समाज को संत कबीर के मार्ग पर चलकर एक नया आयाम दिया। अरविन्द गिरि ने अपने वक्तव्य में कहा कि पिता का साया पुत्र के लिए छाया के समान होता है। जिसके छिनने से व्यक्ति को बहुत बड़ा नुकसान होता है। दिग्विजय सिंह देव ने कहा कि समाज में मरणोपरांत आम जन मानस में किसी भी प्रथा को जबरन थोपा नहीं जाना चाहिए, अपनी सामाजिक व पारिवारिक परम्पराओ के अनुसार रीतिबद्ध होनी चाहिए। अमरेंद्र आर्या ने कहा कि मृत्यु भोज एक गिद्ध भोज है, मृत्यु के पश्चात् किसी भी प्रकार का भोज ना तो आवश्यक है और ना ही इसे समाज के किसी भी व्यक्ति पर थोपा जाना चाहिए, इसे कानून बनाकर के अपराध बद्ध किया जाना आवश्यक है, जिससे समाज में मृत्यु भोज करना-कराना या उसमे शामिल होना राजस्थान जैसे राज्य की तरह इसे अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। प्रदेश नि0 सचिव डा0 जितेन्द्र सिंह यादव ने स्व0 राधे लाल को श्रद्धांजलि दी व कार्यक्रम को संबोधित किया। इस दौरान अनुराग यादव आदि मौजूद रहे।

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