राखी के धागे में सिमटा था पूरे कुनबे का प्यार

गेरू से सजे कच्चे घरों से लेकर कलाई पर बंधे ‘राखा’ तक… बुजुर्गों की यादों में आज भी जिंदा है रक्षाबंधन का वह दौर

 (राजभूषण सिंह)
कंपिल, समृद्धि न्यूज। सावन की फुहारों के साथ जैसे ही रक्षाबंधन की आहट होती थी, गांव के कच्चे घरों और गलियों की छटा ही बदल जाती थी। गोबर-मिट्टी से लिपे आंगन, गेरू की लालिमा से सजी दीवारें और चौखट पर टकटकी लगाए बहन की राह देखते भाई। यह सब बीते दौर के उस रक्षाबंधन का हिस्सा था, जहां बाजार की चकाचौंध तो नहीं थी, मगर रिश्तों की गर्माहट भरपूर थी। कलाई पर बंधने वाला साधारण धागा भले ही बहुत सादा होता था, लेकिन उसके साथ जुड़ा स्नेह आज के महंगे उपहारों पर कहीं भारी था। कंपिल क्षेत्र के बुजुर्गों की स्मृतियों में रक्षाबंधन का वह संसार आज भी पूरी ताजगी के साथ बसा है।

गेरू की लालिमा और मिट्टी की सोंधी महक

हमीरपुर मजरा जाति निवासी ओमपाल सिंह पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि तब गांव में पक्के मकान गिने-चुने थे। पर्व से पहले घर की महिलाएं गोबर और मिट्टी से दीवारों व आंगन की लिपाई करती थीं। उत्सव का रंग भरने के लिए लेप में गेरू मिला दिया जाता था। दीवारों पर गेरू की चमक बिना किसी आधुनिक सजावट के पूरे घर को उत्सवमय बना देती थी।

चमकीली पन्नी वाली बड़ी राखी को कहते थे ‘राखा’

राधेश्याम शाक्य बताते हैं कि आज की तरह तब डिजाइनर राखियों का चलन नहीं था। रंगीन धागे या फोम पर चमकीली पन्नी चिपकाकर बनी राखियां ही कलाई की शोभा बढ़ाती थीं। बड़े आकार की राखी को गांव में ‘राखा’ कहा जाता था। बच्चों में इस बात की होड़ लगी रहती थी कि किसकी कलाई पर सबसे ज्यादा राखियां बंधी हैं।

शगुन का एक-दो रुपया और गुल्लक के सपने

महिपाल सिंह पाल मुस्कुराते हुए बताते हैं कि राखी बंधते ही बच्चों की निगाहें भाई की जेब पर टिक जाती थीं। शगुन में मिलने वाला एक या दो रुपये का सिक्का किसी खजाने से कम नहीं लगता था। कोई भाई खुश होकर पांच या दस रुपये दे दे तो खुशी का ठिकाना नहीं रहता था। वह रकम गुल्लक में जाती और त्योहार के बाद मेले का इंतजार शुरू होता था।

सिर्फ सगे नहीं, पूरे कुनबे का पर्व

बलवीर सिंह के अनुसार, उस दौर में रक्षाबंधन सिर्फ सगे भाई-बहन तक सीमित नहीं था। चाचा, ताऊ और पूरे कुनबे के भाइयों को बहनें स्नेह से राखी बांधती थीं। जब तक परिवार के सभी भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र नहीं बंध जाता था, तब तक भोजन न करने की परंपरा कई घरों में थी। पूरा परिवार एक चौखट के नीचे बैठकर त्योहार मनाता था।

झूलों की पींगें और रेडियो के तराने

कमला देवी बताती हैं कि सावन लगते ही पेड़ों पर झूले पड़ जाते थे और महिलाएं ढोलक की थाप पर सावन के लोकगीत गाती थीं। वहीं रामनरेश पाल जोड़ते हैं कि त्योहार की सुबह रेडियो पर गूंजते गीत ‘भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना’ और ‘फूलों का तारों का, सबका कहना है’ माहौल को भावुक बना देते थे। दूर ब्याही बहन के घर पहुंचने से ही पर्व पूरा माना जाता था।

बदला स्वरूप, कायम है रिश्तों की मिठास

समय के साथ रक्षाबंधन का स्वरूप बदला है। पारंपरिक राखियों की जगह अब डिजाइनर मोतियों, चांदी और आधुनिक सजावट वाली राखियों ने ले ली है। चॉकलेट, ड्राई फ्रूट्स और ऑनलाइन भेजे जाने वाले उपहार भी त्योहार का हिस्सा बन गए हैं। दूर बैठे भाइयों तक राखियां अब कोरियर से पहुंचती हैं और वीडियो कॉल के जरिए भाई-बहन एक-दूसरे से जुड़कर रस्म निभाते हैं।

बुजुर्ग मानते हैं कि समय के साथ बदलाव स्वाभाविक है, लेकिन त्योहार की मूल आत्मा आपसी प्रेम, समर्पण और विश्वास हमेशा अक्षुण्ण रहनी चाहिए। उनके लिए रक्षाबंधन की असली खुशी आज भी वही है बहन के हाथ से भाई की कलाई पर बंधा रक्षासूत्र, माथे पर रोली का टीका और परिवार के साथ बैठकर बांटी गई छोटी-सी खुशी।

गेरू से सजे कच्चे घर, गोबर-मिट्टी से लिपे आंगन, चमकीली पन्नी वाली ‘राखा’, रेडियो से गूंजते राखी के गीत और शगुन में मिले एक-दो रुपये भले ही बीते दौर की तस्वीर बन चुके हों, लेकिन बुजुर्गों की स्मृतियों में वह रक्षाबंधन आज भी उतना ही जीवंत है। राखी का रूप बदला, त्योहार मनाने का तरीका बदला, मगर उस धागे में सिमटा रिश्तों का प्यार आज भी कायम है।

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