नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि अग्रिम जमानत का प्रावधान वस्तु एवं सेवा अधिनियम तथा सीमा शुल्क कानून पर भी लागू होता है तथा कोई व्यक्ति गिरफ्तारी पूर्व जमानत के लिए अदालत जा सकता है, भले ही उसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज न हुई हो। मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने पिछले साल 16 मई को उन याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिनमें सीमा शुल्क अधिनियम और जीएसटी अधिनियम के दंड प्रावधानों को चुनौती दी गई थी और कहा गया था कि ये दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और संविधान के अनुरूप नहीं हैं। फैसला सुनाते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अग्रिम जमानत जैसे मुद्दों पर सीआरपीसी और उसके बाद बने कानून, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के प्रावधान सीमा शुल्क और जीएसटी अधिनियमों के तहत आने वाले व्यक्तियों पर भी लागू होंगे। इसने कहा कि जीएसटी और सीमा शुल्क अधिनियमों के तहत संभावित गिरफ्तारी का सामना करने वाले व्यक्ति एफआईआर दर्ज होने से पहले भी अग्रिम जमानत लेने के हकदार हैं।
गिरफ्तार लोगों पर भी BNSS/CrPC प्रावधान लागू होंगे
इन याचिकाओं में कहा गया था कि ये दंड प्रक्रिया संहिता सीआरपीसी तथा संविधान के साथ असंगत हैं। फैसला सुनाते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अग्रिम जमानत जैसे मुद्दों पर सीआरपीसी तथा उसके बाद के कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के प्रावधान सीमा शुल्क तथा जीएसटी अधिनियमों के तहत आने वाले व्यक्तियों पर लागू होंगे।
‘संदेह के आधार पर गिरफ्तारी नहीं हो सकती’
कोर्ट ने कहा, सिर्फ संदेह के आधार पर गिरफ्तारी नहीं हो सकती। अधिकारियों को गिरफ्तारी से पहले प्रमाणित साक्ष्यरखना होगा, जिसे मैजिस्ट्रेट सत्यापित कर सके। गिरफ्तारी के प्रावधानों में अस्पष्टता के कारण नागरिकों को परेशान नहीं किया जाना चाहिए। GST अधिनियम की धारा 69 (गिरफ्तारी की शक्ति) अस्पष्ट है, इसलिए इसे न्यायालय द्वारा नागरिक स्वतंत्रता को मजबूत करने के दृष्टिकोण से व्याख्या किया जाएगा।कई बार ऐसा लगता है कि जब तक गिरफ्तारी नहीं होती, तब तक जांच पूरी नहीं हो सकती। लेकिन यह इस कानून का उद्देश्य नहीं है। यह गिरफ्तारी की शक्ति को सीमित करता है।
