न टैगिंग न इलाज,चारा-पानी की किल्लते झेलने पर मजबूर बेजुबान, प्रशासन की अनदेखी,तड़पकर कर मर रहे गौवंश,
हरदोई। ब्लाक टोंडरपुर की ग्राम पंचायत चठिया गाँव का गौशाला अव्यवस्था और लापरवाही की ऐसी मिसाल बन चुका है,जहाँ बेजुबान पशु अपने हाल पर खुद ही जूझने को मजबूर हैं।गौ संरक्षण और देखभाल के नाम पर बनाए गए इस गौशाला में व्यवस्थाएँ कागज़ों पर तो दर्ज हैं,लेकिन ज़मीनी हकीकत बेहद भयावह है। ग्रामीणों की मानें तो गौशाला में न तो पशुओं की उचित टैगिंग हुई है,न नियमित चिकित्सीय सुविधा, और न ही चारा-पानी की सामयिक व्यवस्था। नतीजतन हर हफ्ते कम से कम एक पशु की मौत हो रही है।इस दर्दनाक स्थिति के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी उदासीन बने हुए हैं।
टैगिंग अधूरी,गिनती में हेरफेर,
गौशाला में मौजूद पशुओं की वास्तविक संख्या पर भी सवाल उठ रहे हैं।ग्रामीणों के अनुसार यहाँ करीब 50 से 60 मवेशी हैं,जबकि केयरटेकर जागेश्वर 90 पशुओं की संख्या बताते हैं। हैरानी की बात यह है कि इनमें से महज 20–25 पशुओं की ही टैगिंग हुई है,जबकि बाकी पशु बिना पहचान के ही हैं।
टैगिंग प्रक्रिया न होने से बीमार,नए आए या कमजोर पशुओं की पहचान भी ठीक से नहीं हो पाती।जिससे उनके उपचार और देखभाल में समस्याएँ आती हैं।ग्रामीणों का कहना है कि कई महीनों पहले ब्लॉक और पशुपालन विभाग के अधिकारियों को टैगिंग व अन्य अव्यवस्थाओं की जानकारी दी गई थी,लेकिन न तो कोई निरीक्षण हुआ और न ही जिम्मेदारी तय की गई।
गौशाला में न तारपाल न छप्पर,न ही कोई सुरक्षा इंतज़ाम
सर्दी का मौसम शुरू हो चुका है, परंतु गौशाला में पशुओं को ठंड से बचाने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं की गई है। तारपाल,छप्पर,आदि न होने से बूढ़े,कमजोर मवेशी ठंड से जूझ रहे हैं।समय पर इलाज न मिलने के कारण उनकी जान चली जाती है।“यहाँ का हाल देखकर लगता ही नहीं कि यह गौशाला जानवरों की देखभाल के लिए बनी है।
मृत पशुओं को खा जाते हैं आवारा कुत्ते—मानवता को झकझोरने वाली स्थिति
गौशाला की सबसे दर्दनाक तस्वीर उस समय सामने आती है जब मृत पशुओं को समय पर हटाया तक नहीं जाता। ग्रामीण बताते हैं कि मृत गौवंश कई-कई घंटे वहीं पड़े रहते हैं। इस बीच आवारा कुत्तों के झुंड उन शवों को नोच-नोचकर खा जाते हैं।यह दृश्य भयावह ही नहीं है, बल्कि प्रशासन की संवेदनहीनता का भी सबसे बड़ा सबूत बन चुका है।
अधिकारी ध्यान ही नहीं देते,
गौशाला के केयरटेकर जागेश्वर का कहना है कि यहाँ कुल तीन केयरटेकर तैनात दिखाए जाते हैं, लेकिन वास्तविकता में अधिकांश समय सिर्फ वही अकेले मौजूद रहते हैं।उसने कई बार अधिकारियों को बताया कि यहाँ टैगिंग नहीं है, इलाज का इंतज़ाम नहीं है,चारा-पानी की कमी है,लेकिन कोई भी सुनने को तैयार नहीं है।
