समृद्धि न्यूज।
लेख-भारत विविधताओं का देश है। यहाँ भाषाएँ, संस्कृतियाँ, पहनावे और परंपराएँ अलग-अलग होते हुए भी एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। इन सबको जोड़ने वाली सबसे सशक्त कड़ी हमारी हिंदी भाषा है, जिसे देश की राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त है। इसके बावजूद आज का समय यह प्रश्न खड़ा करता है कि आखिर हिंदी बोलने या लिखने में लोगों को शर्म क्यों आने लगी है? क्या हमने अपनी ही भाषा को कमतर समझना शुरू कर दिया है?
आज समाज में कई ऐसे दृश्य देखने को मिलते हैं जहाँ हिंदी में बोलना या लिखना पिछड़ेपन का प्रतीक मान लिया जाता है। कार्यालयों में, इंटरव्यू में, शैक्षणिक संस्थानों में और यहाँ तक कि रोज़मर्रा के सामाजिक व्यवहार में भी अंग्रेज़ी को अनिवार्य बना दिया गया है। कई जगह तो स्थिति यह है कि यदि कोई व्यक्ति धाराप्रवाह अंग्रेज़ी न बोल पाए, तो उसकी योग्यता पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया जाता है। यह सोच न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि आत्मसम्मान को भी ठेस पहुँचाने वाली है।
यह विचार करने योग्य विषय है कि जिस देश की पहचान उसकी भाषा से होती है, उसी देश में अपनी भाषा को हाशिए पर क्यों रखा जा रहा है। हमारे बच्चों को बचपन से ही यह सिखाया जाता है कि सफलता का रास्ता अंग्रेज़ी से होकर ही जाता है। स्कूलों में हिंदी को एक विषय मात्र बनाकर छोड़ दिया गया है, जबकि अंग्रेज़ी को भविष्य की कुंजी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि नई पीढ़ी अपने ही साहित्य, इतिहास और भाषा से धीरे-धीरे कटती चली जाती है।
विडंबना यह भी है कि संसद जैसे सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच पर भी कई जनप्रतिनिधि अंग्रेज़ी में भाषण देना अधिक उचित समझते हैं। सवाल यह है कि वे देश के आम नागरिकों तक अपनी बात कैसे पहुँचाते हैं, जिनमें से अधिकांश हिंदी या अपनी क्षेत्रीय भाषा समझते हैं? जब भाषा ही संवाद का माध्यम है, तो फिर ऐसी भाषा का प्रयोग क्यों किया जाए, जो बहुसंख्यक जनता की समझ से बाहर हो?
प्रशासनिक और व्यावसायिक क्षेत्र में भी यही स्थिति देखने को मिलती है। हिंदी में लिखी गई किताबें अपेक्षाकृत सस्ती मानी जाती हैं, उनकी मांग को कम आँका जाता है, जबकि अंग्रेज़ी पुस्तकों की कीमतें अधिक रखी जाती हैं और उन्हें गुणवत्ता का पैमाना मान लिया जाता है। यह भेदभाव केवल भाषा के आधार पर नहीं, बल्कि लेखक के श्रम और अधिकार के साथ भी अन्याय है। लेखक चाहे किसी भी भाषा में लिखे, उसकी मेहनत समान होती है और उसका सम्मान भी समान होना चाहिए।
हिंदी साहित्य ने देश को मुंशी प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, अज्ञेय और आधुनिक समय में विनोद कुमार शुक्ल जैसे महान रचनाकार दिए हैं। इन लेखकों ने अपनी पूरी रचनात्मक साधना हिंदी भाषा में की और विश्व साहित्य में हिंदी को एक सशक्त पहचान दिलाई। इसके बावजूद यदि आज हिंदी में लिखने वाला लेखक स्वयं को कमतर महसूस करे, तो यह समाज की बौद्धिक असफलता कही जाएगी।
भारत की खूबसूरती उसकी भाषाई विविधता में है। मराठी, भोजपुरी, अवधी, मैथिली, कन्नड़, तमिल, तेलुगु, बांग्ला—ये सभी भाषाएँ हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। हिंदी इन सबको जोड़ने वाली सेतु भाषा है। इसका उद्देश्य किसी भाषा को मिटाना नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलना है। आवश्यकता इस बात की है कि सरकारी कामकाज, साक्षात्कार, पत्राचार और समाचारों में हिंदी को उसका उचित स्थान मिले।
हमें यह समझना होगा कि भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि हमारी सोच, हमारी संस्कृति और हमारी पहचान का आधार होती है। यदि हम अपनी भाषा से ही शर्म करने लगें, तो आत्मगौरव कैसे बचेगा? विदेशों में रहने वाले भारतीय भी गर्व से हिंदी बोलते हैं, क्योंकि वही उन्हें उनकी जड़ों से जोड़ती है। ऐसे में अपने ही देश में हिंदी बोलने में संकोच करना आत्मविरोध के समान है।
आज आवश्यकता है कि युवा पीढ़ी को हिंदी के प्रति सकारात्मक दृष्टि दी जाए। घरों में, विद्यालयों में, पुस्तकालयों में हिंदी की किताबें हों, हिंदी में संवाद हो और हिंदी में विचार रखे जाएँ। हिंदी में बोलना या लिखना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि यह हमारी राष्ट्रीयता, हमारी मानवता और हमारे हिंदुस्तानी होने का प्रमाण है।
हिंदी मेरी है, हिंदी मेरी पहचान है। यह किसी एक वर्ग या क्षेत्र की भाषा नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की आत्मा है। जब हम गर्व से हिंदी अपनाएँगे, तभी सच्चे अर्थों में आत्मनिर्भर और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राष्ट्र बन सकेंगे।
लेखक : पीके सूर्यवंशी
